नीतीश के बाद कौन!

-अगर नीतीश कुमार की सदस्यता गयी तो कौन होगा उनका उत्तराधिकारी

वैसे यह सवाल पूछना अभी बहुत से लोगों को जल्दबाजी लग सकती है, क्योंकि मामला अभी शीर्ष न्यायालय में है। चुनाव आयोग को दो हफ्ते में जवाब दाखिल करना है। उसके बाद मामले के गुण दोष के आधार पर सुनवाई होगी। कुछ नहीं कहा जा सकता कि आपराधिक रिकॉर्ड छुपाने के मामले में उच्चतम न्यायालय का रुख क्या होगा। लेकिन राजनीति तो सम्भावनाओं का मैदान है, और ऐसे में सरकार और बिहार के अंदर यह चर्चा तेज़ हो गयी है कि अगर नीतीश कुमार को पद छोड़ना पड़ा तो उनके बाद जदयू सरकार की बागडोर किनके हाथ होगी। बिहार के अलग-अलग हिस्से में लोगों से रायशुमारी और पार्टी के कई सूत्रों से बात करके हमने यह जानने-समझने की कोशिश की कि नीतीश के बाद कौन! कौन है नीतीश का सबसे विश्वासपात्र!

जीतनराम मांझी वाले प्रसंग के बाद नीतीश कुमार ने भावना की जगह अपने विश्वस्त लोगों पर ही भरोसा किया। ऐसे में नीतीश के बाद संगठन और सरकार के 5 नामों की चर्चा है जो उनकी विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं। कौन हैं ये! राज्यसभा सदस्य आरसीपी सिंह। मंत्री श्रवण कुमार, प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह, सिंचाई मंत्री ललन सिंह और विधानसभा अध्यक्ष विजय चौधरी। ये हैं मुख्यमंत्री की कोर कमिटी। इसमें दो बार विधानसभा अध्यक्ष बनाये गए विजय चौधरी का नाम सबसे ऊपर है। विधानसभा अध्यक्ष का रोल गठबंधन सरकार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है वो भी तब जब आपके सहयोगी ही बिदक रहे हों। ऐसे में नीतीश कुमार ने बिजय चौधरी पर ही दांव खेला। मिलनसार और निर्विवाद नेता विजय चौधरी हमेशा से नीतीश के मिस्टर राईट साबित हुए। जब जीतनराम मांझी ने पार्टी को दोफाड़ कर दिया और वृष्ण पटेल, नरेन्द्र सिंह जैसे सहयोगी भाजपा के दम पर सरकार गिराने का मास्टरमाइंड गेम प्लान रच चुके थे, विजय चौधरी ने हाउस को आर्डर में रखा और साबित कर दिया कि नीतीश के वो हनुमान हैं। महागठबंधन टूटने के बाद भी सदन ढंग से चला और पहली बार आसन पर कोई आरोप भी नहीं लगा। ऐसे में नीतीश कुमार शायद आगे भी अपने हनुमान पर भरोसा करें।

दूसरा नाम है ललन सिंह का। नीतीश के शायद सबसे करीबी मित्रों में शुमार। लेकिन बीच में कुछ ऐसा हुआ कि दोस्ती दुश्मनी में तब्दील हो गयी। दोनों की सियासी राहें जुदा हो गयी। लम्बे समय बाद ललन सिंह को वापस नीतीश दरबार में स्थान मिला। ललन सिंह की हैसियत भी जदयू में बढ़ी लेकिन कहते हैं ना कि एक बार रिश्तों में गांठ पड़ जाये तो फिर वो हमेशा के लिए गांठ ही बन जाती है। ललन सिंह नीतीश कुमार के खासमखास हैं लेकिन अभी भी बहुत सारे लोग उनकी शिकायत मुख्यमंत्री से करते रहते हैं। महत्वाकांक्षा के बेलगाम रथ पर सवार ललन सिंह को सीएम कितनी जगह देंगे, यह सवाल सबकी जुबान पर है।

तीसरा नाम है प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह का। दादा पुराने समाजवादी हैं, नीतीश और लालू से बराबर का रिश्ता रहा है। संगठन कौशल है लेकिन ना तो पहले वाला जनाधार रहा और ना ही उतनी लोकप्रियता। नीतीश कुमार दादा को बहुत सम्मान देते हैं लेकिन कई नेताओं का मानना है कि वशिष्ठ बाबू में प्रशासनिक क्षमता का अभाव है। ऐसे में मुख्यमंत्री उनपर दांव खेलेंगे, इसकी सम्भावना कम ही है।

मंत्री श्रवण कुमार और राज्यसभा के नेता आरसीपी सिंह मुख्यमंत्री के स्वजातीय हैं। जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने के वक़्त भी इनका नाम उछाला गया था। लेकिन कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री को इस बात के नकारात्मक इम्पैक्ट के बारे में बताया था। अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क रहनेवाले नीतीश कुमार नहीं चाहते कि उनपर लालूप्रसाद की तरह कुर्मियों के नेता होने का आरोप लगे। नीतीश ये भी जानते हैं कि किसी सवर्ण को अगर उन्होंने अपनी जगह मनोनीत किया तो उन्हें वो सोशल इंजीयरिंग के जरिये कभी भी सत्ता से बेदखल कर सकते हैं लेकिन ओबीसी या महादलित के किसी को हटाने पर दांव उलटा पड़ सकता है।

फिर एनडीए के प्रमुख घटक दल भाजपा में स्वीकार्यता का भी सवाल है। भाजपा और नीतीश मिलकर ही इस विषय पर अपनी राय बनायेंगे।

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