क्या दलित, ओबीसी कार्ड है एनडीए का मास्टर स्ट्रोक !

लोकसभा चुनाव को लेकर वोटरों को लुभाने की कोशिश शुरू हो गई है, 70 फीसदी आबादी वाले ओबीसी और दलितों के लिए केंद्र सरकार ने कई घोषणाएं की हैं। जिसकी काट विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में सियासी जानकार कह रहे हैं कि बीजेपी ने दलितों और पिछड़ों के सहारे महागठबंधन को मात देने की रणनीति तैयार की है।

केंद्र की मोदी सरकार इन दिनों दलितों और ओबीसी पर बहुत मेहरबान नजर आ रही है। पहले ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा, फिर एससी,एसटी एक्ट पर संशोधन बिल को मंजूरी और अब ओबीसी की जनगणना कराने की तैयारी, ये कुछ ऐसे फैसले हैं जिससे एनडीए दलित और पिछड़ों को अपने पाले में कर विरोधियों को मात देने की फिराक में है।

वहीं दूसरी ओर बिहार में भी एनडीए नए समीकरण के आधार पर विपक्ष पर वार करने की तैयारी में है। हालांकि, बीजेपी इन फैसलों के पीछे किसी भी तरह की राजनीति से इनकार कर रही है। बीजेपी नेता नंद किशोर यादव कहते हैं कि हमारी पार्टी की नीति रही है, सबका साथ, सबका विकास। समाज के अंदर जो लोग पिछड़ गए हैं उन सब को विकास की धारा में लाने का काम किया जा रहा है। देश भर में लगातार मांग होती रही है। पिछले दिनों जो आयोग बने थे उन सभी आयोगों ने भी इसकी अनुशंसा की थी। इसलिए, जब समाज के अंदर यह धारणा बढ़ती जा रही है कि ओबीसी की संख्या स्पष्ट होनी चाहिए, तो सरकार ने जनभावना का कद्र किया।

सियासी जानकार बताते हैं कि बीजेपी भले ही इस मामले में किसी भी प्रकार की राजनीतिक हित साधने की बात से इनकार कर रही है लेकिन देखा जाय तो हाल के दिनों में बिहार सरकार ने भी एक खास स्ट्रैटेजी के तहत दलित –पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए खजाना खोल दिया है। वहीं, जदयू नेता नीतीश मॉडल के बहाने विरोधियों पर हमला बोलने से नहीं चूक रहे हैं। जदयू नेता श्याम रजक ने कहा है कि नीतीश कुमार ने जिस तरह दलित, ओबीसी और आदिवासी के लिए 2005 से आज तक काम किया है वह अपने आप में मिसाल है, और मेरा मानना है कि अगर केंद्र सरकार नीतीश फॉर्मूला को स्वीकार करती है तो यह वंचित समाज के लिए लाभदायक होगा। जानकारों की मानें तो दलित और ओबीसी के पक्ष में फैसले करने से विरोधियों की बेचैनी बढ़ गई है।

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