आख़िर कमज़ोर कड़ी कहाँ है?

-नीलांशु रंजन-

बिहार में नीतीश सरकार द्वारा जब से पूर्ण शराब बंदी लागू की गयी है, उसके कुछ दिनों बाद से ही एक सवाल लगातार लोगों के ज़हन में उठता रहा है कि यह शराब बंदी महज़ शराब दुकानों की बंदी है या यक़ीनन शराब की बंदी है? हालांकि सरकार अपनी पीठ थपथपाने में और इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि गिनाने में कभी पीछे नहीं रही है। हाल में भी नीतीश कुमार ने कहा कि चार करोड़ लोगों ने मानव श्रृंखला में हिस्सा लेकर शराब बंदी के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद की है। हालांकि सच्चाई यह है कि इस मानव श्रृंखला में स्कूल के छोटे छोटे बच्चों को लगाया गया था जिन्हें यह भी नहीं मालूम था कि यह श्रृंखला किसलिए है ? ख़ैर, सबको अपनी पीठ थपथपाने का हक है।

लेकिन शराब बंदी से लेकर आज की तारीख़ तक हर रोज़ शराब की बड़ी खेप पकड़ी गयी और लाखों लीटर शराब अबतक ज़ब्त हो चुकी है, यह इस सच्चाई को बखूबी बयां करता है कि तंत्र या तो नाक़ाबिल है, फ़ेल है या तंत्र की मिलीभगत है और वो तंत्र है पुलिस तंत्र और सफ़ेद पोश। शराब बंदी के बाद किस तरह थाने और पुलिस की कमाई बढ़ी है, यह सरकार को भी मालूम है और हमारे- आपके जैसे तमाशबीन जनता को भी मालूम है।

क्या सरकार बताएगी कि अगर शराब कारोबारियों का सिंडीकेट फल-फूल रहा है तो कैसे? ज़ाहिराना तौर पे इसमें पुलिस की मिलीभगत है। अगर पुलिस के चरित्र पे सरकार को भरोसा है, तो आश्चर्यजनक है।
अभी लालू यादव ने आरोप लगाया है कि जदयू के बड़े नेताओं के यहाँ शराब माफियाओं का पैसा पहुँच रहा है। अब यह आरोप कितना सही है, यह तो सरकार ही बताएगी। लेकिन इतना तय है कि रसूखदारों के यहाँ, चाहे वे किसी भी दल के हों, किसी भी बड़े पद पर हों, उनके यहाँ शराब की पार्टी होती है। ये वही लोग हैं जिन्होंने नीतीश कुमार को दिखाने के लिए शपथ भी ली थी और फोटो भी खिंचवाई थी। आज शराब की बाजाप्ता होम डिलीवरी हो रही है। सरकार बताएगी कैसे? शराब बंदी के बाद शराब व्यापारियों ने धुन कर पैसा कमाया है।

एक सवाल और नीतीश कुमार जी से। 2011 में आरा में ज़हरीली शराब पीने से 30 लोगों की मौत हुई थी। उसका मुख्य अभियुक्त था उदवंत नगर के जदयू का पूर्व प्रखंड अध्यक्ष राकेश सिंह। दो साल की सज़ा काट चुका यह शख़्स हाल ही में मुख्यमंत्री आवास पर दहेज विरोधी अभियान ब्रांड के एम्बेसडर और आरा निवासी हरेन्द्र सिंह के साथ गया था और इसने मुख्यमंत्री के साथ फोटो भी खिंचवाई। यह सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ और लोगों ने इसकी आलोचना भी की है। जदयू प्रवक्ता ने बचाव में बयान दिया है कि सार्वजनिक जीवन में जो होते हैं, उनके साथ कई लोग फोटो खिंचवाते हैं और किसी के माथे पर कुछ लिखा नहीं है। बात सही है। लेकिन यह कोई भीड़ की तस्वीर नहीं है। वह बाज़ाव्ता मुख्यमंत्री के बगल में सोफे पर बैठा है और वह आपके ही दल से जुड़ा रहा है श्रीमान। जब आप शराब बंदी पर ज़ीरो टॉलरेंस की बात करते हैं, तो फिर ऐसी ग़लती हुई कैसे?

वैसे इतिहास गवाह है कि पूरी दुनिया में शराब बंदी असफल रही है। अब अगर नीतीश जी इसमें सफल हो जाएँ तो उन्हें कोटि कोटि बधाई। लेकिन ध्यान रहे कि शराब बंद हो, दुकानें नहीं। ये पब्लिक है सब जानती है।

लेखक टीवी पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व साहित्यकार हैं।

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