क्या इस्तीफे के पीछे है माया का ‘वापसी प्लान’!

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती ने मंगलवार (18 जुलाई) को दलितों पर अत्याचार का मुद्दा राज्यसभा में नहीं उठाने दिए जाने की बात कहकर राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया । उनके इस्तीफा देने के कदम पर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इसी बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गरम है कि मायावती ने यह इस्तीफा सोची- समझी रणनीति के तहत दिया है।

क्योंकि वह 2012 के बाद एक के बाद एक विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं। यही नहीं, 2014 लोकसभा चुनाव में तो उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। लगातार तीन चुनाव में हारने के बाद वापसी करना आसान नहीं है। नाटकीय अंदाज में इस्तीफा देकर वह 2019 लोकसभा चुनाव के लिए नए सिरे से शुरुआत कर रही हैं। हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर वह इसका राजनीतिक लाभ लेना चाहती हैं तो उन्हें ग्राउंड लेवल पर तुरंत काम शुरू करना होगा।

मायावती का राज्यसभा का कार्यकाल 2 अप्रैल 2018 को खत्म होना था और इसमें सिर्फ 8 महीने बचे थे। माया को सिर्फ बीएसपी की ताकत पर राज्यसभा में एक और कार्यकाल नहीं मिल सकता, क्योंकि उनके पास सिर्फ 18 विधायक हैं, जबकि यूपी में राज्यसभा की एक सीट के लिए कम से कम 38 विधायकों की जरूरत होगी। कहना गलत न होगा कि बीएसपी सुप्रीमो अपने राजनीतिक वजूद की लड़ाई लड़ रही हैं।
वहीं बीजेपी दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। मायावती का पारंपरिक वोटबैंक माने जाने वाले दलितों को लेकर बीजेपी की रणनीति भी उनके इस्तीफे के पीछे की वजह मानी जा रही है। बीजेपी नेताओं का दलितों के घर खाना से लेकर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना इसी दिशा में उठाया गया सियासी कदम है। 2014 के लोकसभा चुनावों और यूपी चुनाव में दलितों का रुख बीजेपी की तरफ दिखा।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जिस दिन बीजेपी ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था, उसी रोज साफ हो गया था कि मायावती जल्द ही जवाबी कदम उठाएंगी। सवाल सिर्फ इतना था कि मुद्दा क्या होगा और कब?

राज्यसभा से इस्तीफा के लिए मायावती ने राष्ट्रपति का चुनाव होने के एक दिन बाद का समय चुना। उन्होंने इस कदम से आक्रामक राजनीति का संकेत दिया है। मायावती ने दलितों पर हो रहे अत्याचार को मुद्दा बनाकर राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी है। उनके कैलकुलेशन के हिसाब से टीवी पर लाइव इस्तीफे के ऐलान से अधिक असर पड़ेगा। इसलिए उन्होंने चुपचाप ऊपरी सदन से कार्यकाल खत्म होने का इंतजार करने के बजाय हंगामेदार ढंग से सदस्यता छोड़ने का फैसला किया। मायावती को यह भी लगा होगा कि राज्यसभा में बने रहने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उन्होंने नैतिकता को इस्तीफे का पैमाना बनाया है। इससे पता चलता है कि वह बीजेपी- विरोधी ताकतों के बीच बढ़त लेने की कोशिश कर रही हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इससे कोई फायदा होगा या वह और ज्यादा हाशिए की तरफ धकेल दी जाएंगी?

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