बाजीगर लालू

अब आगे क्या करेंगे !

लालू के समर्थक उनके एक इशारे पर कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। विरोधियों की नजर में वो भ्रष्टाचारी हैं। लेकिन लालू के समर्थक विपक्ष के हर आरोप को समर्थन की लाठी बनाकर उसमें भावनाओं के तेल डालकर लालू के कहे को ही आखिरी सच मानते हैं। ऐसा क्या है लालू में! एम्स में भर्ती लालू प्रसाद आखिर किस तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं और इससे निपटने की आगे की उनकी रणनीति क्या होगी!

रांची के बिरसा मुंडा जेल में चारा घोटाला केस में सजा काट रहे लालू लालू फिलहाल प्रसाद कई बीमारियों से जूझ रहे हैं, डायबिटीज ने परेशान कर रखा है, किडनी पर असर हुआ है, लेकिन इन दर्दों की कोई शिकन उनके चेहरे पर नहीं है. कड़ी सुरक्षा है. घूमना टहलना मुहाल है. हमेशा भीड़ से घिरा रहनेवाला शख्स तन्हा है. अस्पताल का शोर इनके कमरे तक आते-आते फुसफुसाने लगता है. बीच-बीच में डॉक्टरों और नर्सों की हिदायतें. जिद ऐसी कि डॉक्टरों के लाख कहने पर भी इन्सुलिन का इंजेक्शन लेने से मना कर दिया. एक भरोसेमंद डॉक्टर ने कभी कह दिया था कि अगर इन्सुलिन ली तो जिन्दगी भर लेनी होगी. बस अवचेतन में वही बात बैठी है. एक बार जो समझ लिया, फिर लालू ने कभी कुछ और नहीं समझा. कभी राह नहीं बदली, चाहे वो सियासत की पगडण्डी हो या उनकी अपनी ही बीमारी. हालत ऐसी कि सुगर लेवल 320 से कम नहीं हो पा रहा. थक हारकर रिम्स प्रबंधन ने उन्हें दिल्ली भेजने का फैसला किया और 28 मार्च की शाम वो अपनी बीमारियों का झोला लेकर दिल्ली रवाना हो गए. ऐसी मन: स्थिति में भी जब कोई इनसे मिलने आता था तो भाजपा से लड़ने और गरीब गुरबों की बातें ही होती थी. लालू मिलनेवालों से अपनी बीमारी डिस्कस नहीं करना चाहते थे. वो तो भाजपा और मोदी डिस्कस करते रहे. मोदी ही लालू की सबसे बड़ी बीमारी हैं. वो जैसे इसी बीमारी का इलाज़ चाहते हैं.लालू का तिलस्म इन तन्हाईयों ने और बढ़ा दिया है. तभी तो रिम्स की नर्सें उनके साथ सेल्फी लेने की मनुहार कर बैठी. लालू ने किसी को निराश नहीं किया. दर्द को चेहरे पर नहीं आने दिया. अपने बिस्तर पर बैठे और फोटो खिंचाया. इतनी बार झारखण्ड के मुख्यमंत्री रिम्स आये. कभी किसी ने सेल्फी की डिमांड नहीं की. ये लालू का तिलिस्म है. उनका क्रेज़ है. उनकी अपील है, यही लालू को भीड़ में भी अलग करती है.

आखिर ऐसा क्या है लालू में! कुछ लोग उनसे प्यार करते हैं तो कुछ उतनी ही नफरत. इस सवाल का जवाब आपको कई जगह ढूंढना पड़ेगा. इसके लिए आपको बिहार के खेत खलिहानों में जाना पड़ेगा. गाँव गलियों में जाना पड़ेगा. राजनीति की उन दुरभिसंधियों के बीच जाना पड़ेगा, जिनके बीच से लालू निकल पाए. लालू के तिलस्म को समझने के लिए बिहार के उस दौर में जाना पड़ेगा, जब गिने चुने पिछड़े नेता कांग्रेस की शोभा बढाने के लिए होते थे. तब राजनीति के बियाबान में बेजुबान थे पिछड़े. उनकी कोई सुनता तक नहीं था,राजनीतिक भागीदारी तो बड़े दूर की बात थी. ऐसे जटिल सामाजिक ताने बाने के बीच लालू उभरे. ठेठ गंवई अंदाज़ में. लालू का लालुपन उनके बहुत से विरोधियों को मसखरापन लगता है लेकिन यह लालू की स्वाभाविक संवाद शैली है, जो उन्हें उनके लोगों से कनेक्ट करता है. लालू आज चारा घोटाले की वज़ह से बिरसा मुंडा कारा के कैदी हैं. अब तक अलग अलग मामलों में उन्हें 22 साल की सजा हो चुकी है, जिसमें से अकेले 14 साल की सजा तो दुमका के मामले में हुई है. अभी डोरंडा, बांका, पटना समेत कई मामलों में सजा का एलान तक नहीं हुआ है. कानून के जानकारों का आकलन है कि सभी मामलों को मिलाकर 30 साल से ऊपर की सजा इन्हें सुनाई जायेगी. ऐसे में उनकी नियमित जमानत की राह मुश्किल दिखती है. तो क्या लालू अगले चुनाव में राजद की ओर से रैली नहीं कर पाएंगे ! क्या वह मोदी और भाजपा के खिलाफ महाजुटान नहीं कर पाएंगे. क्या वह अपने अंदाज़ में भाजपा की खिल्ली इस बार नहीं उड़ा पायेंगे. क्या उनका उड़नखटोला इस बार बिहार के किसी देहात में नहीं उतरेगा! उनके नहीं रहने से बिहार के चुनावी परिदृश्य प्रभावित नहीं होंगे. ऐसे कई यक्ष प्रश्न हैं, जो चारा घोटाले में इन्हें मिल रही सजाओं से उभर रहे हैं। राजद के नेता तो कहते हैं कि लालू व्यक्ति नहीं विचार हैं, उसी से काम चला लेंगे। लेकिन राजनीति की कड़वी गोलियां विचारों को भी जल्द ही प्रदूषित कर देती हैं। ऐसे में सीबीआई कोर्ट की यह टिप्पणी कि लालू यादव की पार्टी राजद इसी घोटाले के पैसे से बनाई गयी, उनके समर्थकों को नागवार गुजरी। वैसे भी अमूमन न्यायाधीश ऐसी सियासी टिप्पणियां नहीं करते। बिहार में हाल में हुए उप चुनाव में तीन सीटों पर हुए उप चुनावों में राजद ने दो सीटें जीत ली।

तो क्या यह लालू के विचार की जीत है या अभी भी बिहार के पिछड़ों, अल्पसंख्यकों तथा दलितों की लालू में जमी हुई आस्था की जीत है। लालू के बनाये समीकरण और प्रभावी तौर पर उभरे हैं या केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों को लेकर लोगों के मन में गुस्सा है। क्या बिहार के लोगों में नीतीश कुमार की सियासी वादाखिलाफी के खिलाफ गुस्सा और घनीभूत हो रहा है। उपचुनाव के आंकड़े बताते हैं कि राजद ने यादवों और मुसलमानों के अलावा अति पिछड़े वोटों में भी सेंध लगाई है। तो क्या लालू के वोटों का बढ़ना नीतीश कुमार के अति पिछड़े वोटों का ढहना है। ऐसे कई सवाल हैं। जिनकी व्याख्या हर दल के रणनीतिकार अपने अपने तरीके से करेंगे, लेकिन जनता के मूड की व्याख्या क्या सचमुच इतनी आसान है।

अखिल भारतीय पासवान चेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामप्रवेश पासवान कहते हैं कि लालू जी की राजनीति को अंकगणित के सरल फार्मूले से आप नहीं समझ सकते। वो कहते हैं कि लालू जी के समर्थक आपको हर जाति, समाज में मिल जायेंगे, क्योंकि बेजुबान जातियों को उन्होंने आवाज दी है। रामप्रवेश कहते हैं कि अगर लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में नहीं होते तो क्या पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी गया की सांसद होती। रामप्रवेश पासवान कहते हैं कि लालू प्रसाद व्यापक जनाधार वाले नेता हैं, उनकी अपनी अलग वोट अपील है। तो क्या लम्बी जेल यात्रा लालू और राजद की राजनीति को प्रभावित करेगी! इसपर वो कहते हैं कि लालू जी के नहीं रहने से राजद पर असर तो पड़ेगा ही। अब कौन सा दल अपने को पिछड़ों और अति पिछड़ों के करीब ला पायेगा, यह अहम सवाल है।

राजनीति के धुरंधर खिलाडी लालू प्रसाद और राजद को आनेवाली परेशानियों का पता है, लालू प्रसाद को यह भी पता है कि इस बार उनका सियासत के पाला महा धुरंधर नरेंद्र भाई मोदी से पड़ा है, जिनकी रणनीति आगे की होती है। तभी तो अपनी जेल यात्रा से पहले लालू ने तेजस्वी के नेतृत्व को राजद में स्वीकार कराया, रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह, शिवानन्द तिवारी, रामचंद्र पूर्वे, अब्दुल बारी सिद्दकी जैसे वरिष्ठ नेताओं की मार्गदर्शक मण्डली बनाई, जो यह देखती है कि विचारों के तौर पर कोई विचलन नहीं हो। साथ ही लालू ने युवा नेताओं को आगे कर तेज़स्वी को निर्णय लेने की सहूलियत भी दी। राज्यसभा चुनाव में पढ़े लिखे और सवर्ण ब्राह्मण समाज से आनेवाले राजद प्रवक्ता मनोज झा को टिकट देकर युवाओं को यह मैसेज देने की भी कोशिश की कि हर मेहनती कार्यकर्ता को सम्मान मिलेगा।

तेजस्वी ने भी तेजी से लालू की नीतियों को जमीन पर उतारा और वो अपनी विनम्र छवि से युवा मतदाताओं में अपना मिथक रचने में कामयाब भी हुए। तेजस्वी लगातार मुद्दे पर बात करते रहे, उन्होंने वोटरों से भावनात्मक अपील भी की और उसका नतीजा भी मिला। लालू का यह उत्तराधिकारी आनेवाले दिनों के सियासी रण के लिए इस बदलते हुए राजद को लालू की राजद से आगे ले जाने के लिए जी तोड़ मेहनत भी कर रहा है। अब बदलती हुई राजद की असली परीक्षा तो अगले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दिखेगी लेकिन इतना तय है कि राजग और राजद ही बिहार की राजनीति के दो ध्रुव होंगे। शहर से गांव तक गोलबंदी होगी, लेकिन अदालती फैसलों में उलझे लालू शायद इस इस सियासी संग्राम में उतनी सक्रियता ना दिखा पायें। विपक्ष शायद इस बात से खुश हो लेकिन कहीं लालू की भावुक अपील लालू से भी भारी ना पड़ जाये, जिसका अंदेशा बहुत लोगों को है।

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