झारखंडी राजनीति की यह कौन सी परंपरा !

(मनोज कुमार सिंह) झारखंड में लोकतांत्रिक गरिमा लगातार गिर रही है. विगत 3 दिनों से विपक्ष और सरकार के बीच जो रस्साकशी और तनाव देखा जा रहा है, वह झारखंड के राजनीतिक भविष्य खासकर सरकार के लिए अच्छा नहीं है. नौकरशाहों के प्रति जिस जवाबदेही के साथ सरकार को जवाब देना चाहिए अथवा विपक्ष को जिस मर्यादा के साथ इन मुद्दों को उठाना चाहिए, वहां ऐसा लगता है कि सभी लोग अमर्यादित हुए हैं. इसका खामियाजा राज्य की जनता भुगत रही है. आने वाले दिनों में राजनीतिक पार्टियों के नेता एवं तमाम संबंधित संस्थाओं को भी इसका भार उठाना पड़ेगा. यदि सही मूल्यांकन किया जाए तो यह संविधान के मूल भावना के भी खिलाफ है. राज्य गठन के पश्चात से ही यहां के नौकरशाह सरकार और नेताओं के ऊपर अपना दबदबा कायम रखे जो एक गलत परिपाटी थी. हर व्यक्ति जब वह सरकार में था, उसने अपनी सुविधाओं और दल के फायदे के लिए नौकरशाहों का इस्तेमाल किया, धीरे-धीरे राज्य के नौकरशाहों ने यहां के नेताओं की जमीनी हकीकत का पैमाना ही नाप लिया. क्यों ऐसा लगता है कि ये इतने ताकतवर हो गए हैं, जिन पर जवाबदेही तय करना सरकार को भारी पड़ने लगा. कहीं ऐसा तो नहीं इन सब खेल के पीछे कोई और एजेंडा चल रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि विपक्ष में बैठे हुए लोग जन भावना से ओतप्रोत ना होकर अपने विद्वेष के कारण इस मामले को चढ़ा बढ़ाकर एक्सपोज कर रहे हैं? लेकिन अगर देखा जाए तो यह दोनों ही स्थितियों राज्य हित में नहीं है. सभी की अपनी मर्यादाएं हैं, जवाबदेही हैं, कानूनी अधिकार हैं.

आखिर क्या ऐसा हुआ कि बात पटरी से उतर गई और हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं, इस गंभीर मुद्दे पर यदि कोई बड़े फैसले नहीं लिए जाते हैं तो संस्थाओं के भीतर वे नौकरशाह अपने आप को नौकरशाह नहीं तानाशाह समझने लगेंगे. उनकी ताकत और बढ़ेगी और वह उन सभी मर्यादाओं को तोड़ने की कोशिश करगें जिसकी कल्पना शायद आज नहीं की जा रही है. बहुमत की सरकार अगर आज असहाय या कमजोर दिख रही है, अधिकारियों को बचाने के मामले में एक्सपोज हो रही हो तो नैतिकता की राजनीति करने वाले लोग और उन संस्थाओं को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है. लोग तो पूछेंगे ही लेकिन क्या फर्क पड़ता है इन्हें! जनता चुपचाप इस नाटक को देख रही है. लोग स्तब्ध है कि बजट सत्र में लोक हित एवं जनहित की बातें ये माननीय कब उठाएंगे!

यक्ष प्रश्न यह भी है कि नौकरशाह के प्रश्न जनभावना के प्रश्न से काफी ऊपर दिखने लगे हैं. इसकी जवाबदेही कौन तय करेगा? ऐसा लगता है भंवर में फंसे इस राज्य को किसी कुशल नेतृत्व, मजबूत इरादे वाले राजनेता की जरूरत आन पड़ी है। सुबह जब अखबार की सुर्खियों में सदन और माननीयों के बीच हुए गतिरोध एवं उनके द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा को देख कर मन विचलित होता है. राज्य के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते दुख होता है, मन व्यथित होता है. इन राजनेताओं को आईना दिखाने का समय आ गया है, जनता के समक्ष आईना दिखाने समय आ गया है. इन नौकरशाहों के खिलाफ कड़े फैसले लेने का भी.

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