क्या उद्धव ठाकरे ममता जैसी हिम्मत दिखा पाएंगे!

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर शिवसेना ने अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। पार्टी मोदी सरकार पर हमला तो कई बार कर चुकी है लेकिन इस बार वो एनडीए से अलग होने तक की धमकी दे रही है। सियासी हल्कों में ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या उद्धव ठाकरे यूपीए-2 में ममता बनर्जी वाला इतिहास दोहरा पाएंगे? गौरतलब है कि गैस सिलेंडर की लिमिट और पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर ही ममता बनर्जी ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लिया था।

सोमवार को शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने महंगाई और किसानों के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा और कहा, 'बेतहाशा बढ़ती महंगाई और किसानों के मुद्दे अब तक सुलझे नहीं हैं। हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं और यह दाग नहीं झेलना चाहते।' संजय राउत ने यहां तक कहा कि केंद्र सरकार में हम बने रहेंगे या नहीं, इसका फैसला जल्द ही पार्टी बैठक में लिया जाएगा।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब शिवसेना ने मोदी सरकार के खिलाफ तल्ख तेवर दिखाए हों। दोनों के बीच रिश्तों में खटास तभी देखी गई जब 18 सांसदों वाली शिवसेना को मोदी सरकार में महज एक बर्थ मिली। शिवसेना के जले पर नमक तब छिड़का जब पीएम मोदी ने शिवसेना नेता सुरेश प्रभु को बिना उद्धव की सहमति के न सिर्फ कैबिनेट में शामिल किया बल्कि उन्हें रेल मंत्रालय जैसा अहम विभाग भी थमा दिया।

मोदी की बुलेट ट्रेन हो या नोटबंदी, पाक नीति हो या किसानों की कर्जमाफी शिवसेना लगातार मोदी सरकार पर निशाना साधती रही है। दूसरी ओर बीजेपी ने भी शिवसेना के तीखे तेवरों को कभी भाव नहीं दिया। मोदी मंत्रिमंडल में तीन बार विस्तार कर चुके हैं लेकिन शिवसेना की अनदेखी ही हुई। पार्टी खुलकर इसे लेकर अपनी नाराजगी जता चुकी है लेकिन न तो पीएम मोदी और न ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह उसकी मांग के सामने झुकने को तैयार हैं।

शिवसेना और बीजेपी के बीच की तल्खी सबसे ज्यादा तब देखी गई जब दोनों पार्टियों ने अपने दशकों से चले आ रहे गठबंधन को तोड़ते हुए महाराष्ट्र में अलग-अलग विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया। यहां भी शिवसेना को मुंह की खानी पड़ी। नतीजे बीजेपी के पक्ष में गए और शिवसेना के पास फडणवीस सरकार का हिस्सा बनने के सिवा कोई चारा नहीं रहा। यहां तक कि इसी साल बीएमसी चुनाव भी दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा।

शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन को लेकर अंतिम फैसले की घोषणा भले ही कर दी हो लेकिन उसके लिए अलग होने का फैसला करना आसान नहीं होगा। पार्टी को एनडीए से अलग होने की कीमत केंद्र व राज्य की सत्ता से बाहर होकर चुकानी पड़ेगी। जबकि उसके अलग होने से केंद्र सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा और महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार के पास भी एनसीपी से मिलकर सरकार बचाने का विकल्प खुला रहेगा। ऐसे में क्या उद्धव ठाकरे इतना साहस दिखा पाएंगे, कि जनता के मुद्दों को लेकर एनडीए से अलग हो जाएं और बीजेपी के खिलाफ सड़कों पर उतरकर अपना जनाधार बढ़ाएं। सितंबर 2012 में ममता बनर्जी ने यही किया था। सवाल है कि क्या उद्धव ममता बनने की हिम्मत दिखा पाएंगे?

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