फिर शुरू हुई तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट !

मिशन 2019 को लेकर भले ही बीजेपी पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एक बार फिर से केंद्र में सरकार बनाने की बात कह रही हो। उधर कांग्रेस भी राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में पार्टी को सशक्त कर बीजेपी को पटकनी देने की जुगत में हो। लेकिन इन सब के बीच कांग्रेस और बीजेपी से इतर कुछ ऐसे दल भी देश में हैं तो एक बार फिर तीसरे मोर्चे पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और इसे शक्ल देने की कोशिश कर रहे हैं। इस बार तेलंगाना के सीएम केसीआर ने इसे हवा दी है। हालांकि देखा जाय तो तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद कोई नई नहीं है। देश में पिछले करीब तीस सालों से ऐसी कोशिशें चल रही हैं, लेकिन ज्यादातर बार इस मोर्चे के कई दलों की निजी महत्वकांक्षा के आगे ये मोर्चा ठोस शक्ल नहीं ले सका। बहरहाल, पुरानी बातों को दरकिनार कर 7वीं बार 'तीसरा मोर्चा' बनाने की कोशिश की जा रही है।

ध्यान रहे कि टीआरएस के प्रमुख चंद्रशेखर राव ने कहा था कि 2019 चुनावों के लिए लोग भारत में बदलाव चाहते हैं। मैं एक समान विचाराधार वाले लोगों की बात कर रहा हूं। यदि आवश्यक हो तो मैं आंदोलन का नेतृत्व करने को तैयार हूं।' यदि लोग नरेंद्र मोदी से गुस्‍सा हो गए तो राहुल गांधी या कोई और गांधी नया प्रधानमंत्री बन जाएगा। इससे क्‍या फर्क पड़ेगा?

उन्होंने कहा, 'हमने पहले भी दशकों तक उनकी सरकारों को देखा है। देश की मौजूदा राजनीति में बदलाव की जरूरत है। कांग्रेस और बीजेपी से अलग विकल्प तैयार करने की आवश्यकता है।' केसीआर के इस बयान को पहले असदुद्दीन ओवैसी ने भी समर्थन किया है। इसके बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने उन्हें फोन करके अपनी स्वीकृति दी। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केसीआर के साथ तीसरे मोर्चे बनाने के लिए अपना समर्थन दिया।

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा ने कई दलों के साथ मिलकर भाजपा की राह रोकने की कोशिश की थी। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका था। 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले वाम मोर्चे ने बसपा, बीजद, टीडीपी, अद्रमुक, जेडीएस, हजकां, और एमडीएमके के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील मोर्चा बनाया, पर नतीजा अच्छा नहीं रहा। चुनाव से पहले इस मोर्चे के सदस्यों की संख्या 102 थी जो घटकर 80 रह गईं।

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले 2013 में राजनीतिक दल 'गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस मोर्चा' खड़ा करने के लिए कवायद की गई। इनमें 4 वामपंथी दलों के साथ सपा, जेडीयू, अन्नाद्रमुक, जेडीएस, झारखंड विकास मोर्चा, असम गण परिषद और बीजद शामिल थे। हर बार की तरह इस बार भी नाकाम साबित हुआ।

2014 में देश की सत्ता में नरेंद्र मोदी के आने के बाद से मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद की गई थी। इसके लिए सपा, जेडीयू, आरजेडी, इनोलो, आरएलडी सहित तमाम दलों ने कई बैठक की पर इसे अमलीजामा नहीं पहना सके। बिहार के चुनाव से पहले मुलायम सिंह ने अपना कदम पीछे खींच लिया और आखिर में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने महागठबंधन बना लिया। इस दोस्ती का सफर 20 महीने ही चल सका। पिछले साल नीतीश कुमार महागठबंधन से नाता तोड़कर दोबारा बीजेपी में मिल गए।

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