सुबोधकांत होंगे झारखण्ड कांग्रेस के कप्तान!

झारखंड में सभी राजनीतिक पार्टियां चुनावी मोड में आ गई हैं। भाजपा ने जहां हाल ही में कार्यकारिणी की बैठक में मिशन 60 प्लस का टारगेट सेट किया है। वहीं जेएमएम ने भी आगामी विधान सभा के चुनाव को लेकर बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को भाजपा की नीतियों के खिलाफ उलगुलान करने को कहा है। इन सब के बीच कांग्रेस ने भी पार्टी को दुरूस्त करने की कवायद तेज कर दी है।

हाल ही में यूथ कांग्रेस का चुनाव कराया गया। ताकि युवा कार्यकर्ता जोर शोर से चुनाव की तैयारियों में जुट सकें। भाजपा की नीतियों के खिलाफ पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे कथित विकास कार्यों का पर्दाफास कर उन्हें घेरने की तैयारी कर ली है। केंद्रीय नेतृत्व ने आरपीएन सिंह को झारखंड कांग्रेस का प्रभारी बनाया है। उन्होंने तीन दिवसीय दौरे में हरेक नेता से राज्य और पार्टी के हालात पर विस्तृत चर्चा की है। झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पार्टी के अंदर कवायद भी जोर पकड़ती नजर आ रही है। प्रदेश के जिला स्तर से लेकर बड़े नेताओं से भी कांग्रेस आलाकमान फीडबैक ले रहा है और जल्द ही इस पर फैसला लिया जाएगा।

अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदारों में सुबोधकांत सहाय का नाम सबसे ऊपर है। इसके बाद के. एन त्रिपाठी, प्रदीप बलमुचू और अरूण उरांव का भी नाम सामने आया है। हालांकि पार्टी के अंदर अधिकांश लोगों का यह मानना है कि सुबोधकांत सहाय इस पद के लिए सबसे उपयुक्त हैं। सुबोधकांत सहाय के पक्ष में जो बात जाती है वह है उनका सभी विपक्षी दलों के बीच सर्वमान्य होना। इधर हाल में उन्होंने राज्य सरकार के खिलाफ किये गए प्रदर्शनों और आंदोलनों में पूरे विपक्ष को जिस प्रकार एक छत के नीचे खड़ा किया है वह उनकी स्वीकार्यता को दर्शाता है। इसके अलावा वे विभिन्न मुद्दों पर लगातार राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं को बल मिला है। यदि पार्टी जनमुद्दों को लेकर जनता के बीच संघर्ष करती है तो जनाधार बढ़ेगा। उनकी प्रतिबद्धता को देखते हुए आने वाले दिनों में झारखंड की बागडोर अगर उन्हें सौंपी जाय तो कांग्रेस में नई जान फूंकी जा सकती है।

देखा जाय तो कांग्रेस में सबसे अधिक अनुभव वाले राष्ट्रीय पहचान के इकलौते शख्सियत हैं। बहरहाल, हमेशा की तरह अध्यक्ष बनाने को लेकर पार्टी के अंदर खेमेबाजी दिख रही है। वहीं कई नेता पारंपरिक रूप से किसी आदिवासी नेता को अध्यक्ष बनाने पर जोर दे रहे हैं। पर आगामी लोकसभा और फिर विधान सभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस आलाकमान इस बार परिवर्तन के मूड में है।

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