गैर नहीं, अपने ही लेंगे डॉ अजय का इम्तिहान

21 नवंबर को डॉक्टर अजय कुमार ढोल-नगाड़े के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की ताज पहनेंगे। मौके की दस्तूर और आलाकमान का वरदहस्त है, लिहाजा कार्यकर्ताओं में खूब जोश भी भरेंगे। पार्टी को नई उचाईयों पर ले जाने की शपथ लेंगे।

जो लोग कांग्रेस के इतिहास को ठीक से समझते-बूझते हैं वे जानते हैं कि डॉक्टर अजय कुमार की राह में फूल कम और कांटे अधिक हैं। हालांकि पार्टी के अंदर से उठ रही गैर आदिवासी कप्तान की मांग को आलाकमान ने मान लिया है पर एक तरह से पार्टी ने रणनीतिक दांव ही खेला है। इतिहास में पहली बार गैर आदिवासी के हाथों संगठन का कमान दिया गया है। डॉ अजय के नेतृत्व में मौजूदा प्रदेश कांग्रेस नया सफर शुरू करने जा रही है।

झारखंड में कमजोर हो चुकी कांग्रेस में जान फूंकना, कांग्रेस को फिर से खड़ा करने जैसा है। डॉक्टर अजय कुमार के कंधे पर दोहरी जिम्मेवारी है। बिखरे संगठन को समेटना और पार्टी का राज्य में जनाधार बढ़ाना। कहने को तो कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन पिछले कई दशकों से बेहतर रणनीति के अभाव में यह लगातार सिमटती जा रही है।

पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इसकी वजह यह मानते हैं कि झारखंड गठन के बाद से कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष लगातार आदिवासी ही रहा। इनके नेतृत्व में पार्टी का जनाधार बढ़ने की जगह धीरे-धीरे कम होता चला गया। बहरहाल डॉ अजय के समक्ष कई चुनौतियां हैं। कई धड़ों में बंटी कांग्रेस को एक मंच पर लाने के लिए काफी मशक्त करनी पड़ेगी।

तेजतरार पूर्व आईपीएस अधिकारी डॉ अजय कुमार राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर अपना जौहर दिखा चुके हैं अब देखना है कि पार्टी के अंदर मौजूद कांग्रेस के कद्दावर नेता सुबोधकांत सहाय, सुखदेव भगत, प्रदीप बलमुचू, राजेन्द्र सिंह और आलमगीर आलम जिनकी अपनी डफली अपना राग है इनसे कैसे निपटते हैं। इन नेताओं को एकजुट करना उन्हें पार्टी के गतिविधियों से जोड़कर रखना बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

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