लालू की बेचैनी का समाजशास्त्र

चारा घोटाले में लालू प्रसाद को रांची सीबीआई कोर्ट कल सजा सुनाएगी. उनकी सजा के बाद लालू के समर्थक और उनके विरोधी इसके राजनीतिक आकलन में जुट जाएंगे, लेकिन लालू ने कोर्ट में पेशी के दौरान जितनी बेचैनी दिखाई, उससे बिहार का राजनीतिक समाजशास्त्र बदलने लगा है. लालू ने कोर्ट में पेशी के दौरान जब-जब कहा कि हुजुर जेल में बहुत ठण्ड लगती है तो उनके समर्थक दर्द और ठण्ड से थरथराने लगे. लालू की बेचैनी से निकली आह उनके समर्थकों को परेशान कर जाती है. यही लालू का तिलस्म है, जिसे आज तक उनके विरोधी भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं.

लालू की ताकत है, उनकी सम्प्रेषनीयता, आम जुबान में आम लोगों से कनेक्ट करने की उनकी ताकत. लालू जब कोर्ट में जज साहेब से कहते हैं कि जेल में कई जज साहेब भी बंद हैं, उन्हें दिक्कत हो रही है, तो वह अपने समर्थकों के साथ-साथ सिस्टम को यह बताने की कोशिश करने में सफल भी होते हैं कि केवल उन्हीं पर आरोप नहीं है. आरोप तो जज पर भी लगे हैं. केवल आरोप लगाने भर से कोई मुजरिम नहीं हो जाता.

लालू प्रसाद ने गरीबों, पिछड़ों को जुबान दी, राजनीतिक ताकत दी. आज इस व्यापक समूह में लालू प्रसाद की स्वीकार्यता है. लालू का समर्थक वर्ग उन्हें अपराधी नहीं मानता. वह तुरंत लालू की अन्य अगड़े नेताओं से तुलना कर यह समझाने की कोशिश करता है कि ऐसा अपराध अकेले लालू ने नहीं किया है. दरअसल आमलोगों की फितरत को समझना ही लालू की यूएसपी है. यह एक ऐसा समीकरण है, जिसकी काट कोई खोज नहीं पाया.

यह सही है कि नीतीश कुमार ने सामजिक न्याय की गोलबंदी के अंदर एक नयी गोलबंदी कर लालू के असर को कम करने की राजनीतिक कोशिश की और इसमें वो बहुत हद तक कामयाब भी रहे. नीतीश ने अति पिछड़ों और महा दलित का गठजोड़ कर बिहार में एक दफा लालू को राजनीतिक रूप से कार्नर करने में सफलता भी पाई. लेकिन जानकार इसे नीतीश की अस्थायी राजनीतिक सफलता मानते हैं.

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