राजनीति का साइड इफ़ेक्ट, जब जेल गेट पर रोईं राजबाला

चारा घोटाले में लालू यादव को सजा होने के बाद दो दशक से पुराना ये मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. पर इस घोटाले से जुड़ी कई दिलचस्प किस्से भी हैं. थोड़ा पीछे चलिए, इतिहास के पन्नों को पलटिए, करीब 21 साल पहले 30 जुलाई 1996 का दिन चारा घोटाले के इतिहास में सबसे अधिक सनसनीखेज वाला दिन था़. उस दिन लालू प्रसाद ने चारा घोटाला के आरसी/20/96 मामले में कोर्ट में समर्पण किया था. लालू यादव को सीबीआइ गिरफ्तार करना चाहती थी, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था. क्योंकि पटना के जिला प्रशासन ने ऐसा होने नहीं दिया. केंद्रीय जांच एजेंसी ने खूब मशक्कत की, खूब माथापच्ची की, विकल्प के रूप में सीबीआइ ने 29 जुलाई की सुबह पटना हाईकोर्ट में चारा घोटाला की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश एसएन झा से उनके आवास पर भेंट की.

इसके बाद सीबीआइ के अधिकारियों ने दानापुर कैंट में सेना के अधिकारियों से मदद मांगी, ताकि वे लालू प्रसाद को गिरफ्तार कर सकें. इन सब के बीच यह जानना जरूरी है कि लालू की गिरफ्तारी के बीच में आड़े कौन आ रहा था. तब राजबाला वर्मा पटना की जिलाधिकारी थीं. सीबीआइ ने रैपिड एक्शन फोर्स के डीआइजी से पुलिस बल की मांग की. इसके बाद पुलिस बल सीबीआइ के कार्यालय पर पहुंच भी गया, लेकिन राजबाला वर्मा ने बल के डीआइजी को स्पष्ट निर्देश दे दिया कि बिना उनकी इजाजत के पुलिस बल एक कदम भी आगे नहीं बढ़ेगा. उस दिन मुख्य सचिव, डीजीपी, एसएसपी ने मोबाइल बंद कर दिया था, लैंडलाइन पर भी उपलब्ध नहीं थे. घर-ऑफिस से गायब हो गये थे. पूरा शासन कानून की धज्जियां उड़ा रहा था.

सीबीआइ के अधिकारियों ने अपने प्रतिवेदन में अंकित किया है कि पटना जिला प्रशासन द्वारा लालू प्रसाद को गिरफ्तार करने के हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन करने से इनकार कर दिये जाने के कारण उन्हें सेना की मदद लेने के लिए विवश होना पड़ा. कोर्ट में सरेंडर के लिए जाते समय पटना की सड़कों पर लंबा जुलूस लेकर वे कोर्ट गये और अपनी गिरफ्तारी दी. इसके बाद उन्हें बेऊर जेल भेजा गया. वहां से कुछ ही क्षणों में उन्हें एक गेस्ट हाउस में भेज दिया गया और गेस्ट हाउस को जेल का दर्जा दे दिया गया. लोग बताते हैं और उस समय के कतिपय समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया है कि जब लालू प्रसाद बेऊर जेल भेजे गये, तब पटना की तत्कालीन जिलाधिकारी जेल गेट के सामने फूट-फूट कर रोने लगीं. शायद प्रशासन द्वारा तमाम प्रयासों के बावजूद लालू प्रसाद को गिरफ्तार कर उन्हें जेल जाने से रोक नहीं पाने के कारण इनके आंसू निकलने से रुके नहीं.

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