सम्मान बचाने की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं सरयू राय

मनोज कुमार सिंह
बजट सत्र के दौरान सरयू राय ने संसदीय कार्य मंत्री के पद से जैसे ही इस्तीफा दिया उसके अगले ही दिन उनके इस्तीफे को मंजूर कर सरकार ने यह मनसा जता दिया था कि आपका प्रेशर नहीं चलेगा। सरयू राय जी अपना दुखड़ा लेकर केंद्रीय नेतृत्व के पास भी गए लेकिन वहां भी उनको कोई खास तवज्जो नहीं मिला। दिल्ली से लौटने के पश्चात सरयू राय सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए राज्य के मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के खिलाफ खुलकर पत्र लिखने लगे और समाचार पत्रों के माध्यम से उन्होंने सीधी लड़ाई का मोर्चा खोल दिया। अब ऐसा लगता है कि सरयू राय अपनी लड़ाई में अलग-थलग पड़ते नजर आ रहे हैं और अपना सम्मान बचाने के लिए उन्होंने पूरे झारखंड का दौरा करने का निर्णय लिया है।

जानकारों का मानना है कि सरकार में बैठे लोग उनको कोई खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं, और इसी तिलमिलाहट के कारण वह अब सम्मान बचाने के लिए अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। इसकी बानगी कल प्रदेश अध्यक्ष के बेटी के शादी समारोह के दौरान भी दिखी मुख्यमंत्री और सरयू राय दोनों शादी समारोह में अगल बगल की कुर्सियों पर बैठे दिखाई तो दिए लेकिन हालात बता रहे थे कि दोनों के बीच दूरियां काफी बढ़ गई हैं। सरयू राय राजबाला के मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं है और वह चाहते हैं कि 28 फरवरी के पहले सरकार राजबाला वर्मा को उनके पद से हटाए और उनके खिलाफ कार्रवाई करे, लेकिन सूत्रों का मानना है कि सरकार राजबाला के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाने जा रही है। यदि ऐसा हुआ तो सरयू राय और भी आक्रामक होंगे और इसके दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं क्योंकि वह एक मजे हुए राजनीतिज्ञ है और किसको कहां पटकनी देना है अच्छी तरह से जानते है। इतना तो तय है कि इस लड़ाई का परिणाम भारतीय जनता पार्टी को सिवाय नुकसान के और कुछ नहीं दे सकती है, कहा तो यह भी जा रहा है कि होली के तुरंत बाद खुले और सार्वजनिक तौर पर जो संघर्ष चल रहा है उसका कोई सम्मानजनक हल निकाला जा सके लेकिन जो सुई चुभ रही है उसका क्या होगा। क्योंकि सरयू राय जी के पॉलिटिकल स्टाइल का यह फंडा रहा है कि "कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना" अब यह देखना है कि उनका निशाना सही जगह पर लगा या इस बार वह अपने निशाने से चूक गए। ऐसा नहीं है कि यह सब मामला अचानक पैदा हुआ हो बल्कि लोगों का यह मानना है कि सरकार के अंदर बहुत पहले से ईगो की लड़ाई शुरू हो गई थी, क्योंकि राज्य में जिस प्रकार से सरकार का नियंत्रण चल रहा था उससे राज्य के लगभग सभी मंत्री अंदर ही अंदर अपने को ठगा महसूस कर रहे थे, लेकिन सार्वजनिक तौर पर बोलने से बचना चाहते थे। व्यक्तिवादी सोच के फार्मूले को अमलीजामा बनाने का काम जो कर रहा था, उसमें मुख्य सचिव की भूमिका सबसे ऊपर थी और यही वह कारण था जो सरयू राय को चुभ गया, दबी जुबान से कई बार उन्होंने इसका विरोध तो किया लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

सरयू राय के पास अपना सम्मान बचाने के लिए खुले संघर्ष के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं था और उन्होंने बजट सत्र जैसे अहम मौके पर संसदीय कार्य मंत्री से अपने को अलग कर लिया। यद्यपि उनको यह विश्वास था कि इस्तीफे के तुरंत बाद मान-मनौव्वल और अंदर की बारीकियों को सुलझाया जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री के अड़ियल रुख के चलते ऐसा ना हो पाया और सरयू राय का दांव उल्टा पड़ गया। विगत दिनों जो कुछ भी राज्य में राजनीतिक ड्रामा चला, लगता है कि उस डैमेज कंट्रोल को सुलझा लिया गया है और सरयू राय जी को अभिमन्यु की तरह अब अकेले चक्रव्यूह को तोड़ने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। उनके तरकस का अंतिम तीर- भूख से हुई मौत- पर आने वाली रिपोर्ट और कुछ और सियासी फंडे हो सकते हैं क्योंकि सरजू राय जी मंजे खिलाड़ी है, और इतनी जल्दी हथियार डाल देंगे ऐसा लगता तो नहीं है। राजनीति के जानकार पंडितों का मानना है कि ऐसे वरिष्ठ और कद्दावर नेता का सम्मान बचाना संगठन और सरकार दोनों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। क्योंकि श्री राय बैकफुट पर जाने के लिए शायद ही तैयार हो। वैसे भी राज्य का राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है, एक तरफ कुर्मी जाति के लोग अपने को अनुसूचित जन-जाति में शामिल करने की लड़ाई लड़ रहे है, वहीं दूसरी ओर OBC के नेता 27 परसेंट आरक्षण के मुद्दे पर तेजी से गोल बंद हो रहे हैं, और तीसरी और आदिवासी नेता और उसके सामाजिक संगठनों द्वारा पुरजोर विरोध हो रहा है कि किसी को एसटी का दर्जा अगर दिया गया तो वर्ग संघर्ष छूट जाएगा। ऐसे नाजुक हालात में भारतीय जनता पार्टी और उसके रणनीतिकार अपने घर की अंदरूनी लड़ाई को कैसे सुलझाते हैं, इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई है?

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