उठ रहे सवालों की बजाय सरयू राय को ही निपटा दिया CM ने

मनोज कुमार सिंह
विगत दिनों बजट सत्र में जो गतिरोध पैदा हुए थे, उसका समाधान करने की बजाय मुख्यमंत्री ने अपने संसदीय कार्य मंत्री और सबसे वरिष्ठ नेता सरयू राय को ही निपटा दिया। सरयू राय ने अपने को संसदीय कार्य के पद से मुक्त करने का पत्र मुख्यमंत्री को लिखा था, उसी दिन अनिश्चित काल के लिए सदन स्थगित कर दिया गया। 1 फरवरी को सरयू राय के घर विधायकों की बैठक और अर्जुन मुंडा के घर विधायकों के आने जाने को लेकर मुख्यमंत्री के सलाहकारों ने फिर उनकी कान फूंकी। 2 फरवरी को आनन फानन में पार्टी के अंदर चल रहे अंतर्कलह और गतिरोध को खत्म करने के बजाए बाहुबली अंदाज में सरयू राय की छुट्टी कर दी गई। संसदीय कार्य मंत्री का जिम्मा ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा को सौंपा गया है।

जैसे ही शाम 7:00 बजे सरयू राय को संसदीय कार्य मंत्री पद से मुक्त करने की अधिसूचना जारी की गई, सरयू राय सीधे पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के आवास पर पहुंचे, उसके कुछ ही क्षण बाद विधानसभा के मुख्य सचेतक राधाकृष्ण किशोर भी वहां पहुंच गए। इन तीनों लोगों के बीच क्या बातें हुई, यह तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन आगामी कुछ दिनों में भारतीय जनता पार्टी के भीतर कुछ और बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। विदित हो कि सरयू राय और रघुवर दास दोनों जमशेदपुर के अगल-बगल विधानसभा से जीत कर आते है, राजनीतिक कद के हिसाब से देखा जाए तो सरयू राय काफी वरिष्ठ और झारखंड के तमाम बड़े नेताओं से व्यक्तिगत संबंध के चलते लोकप्रिय नेता रहे हैं, हालांकि रघुवर दास का राजनीतिक जीवन भी लंबा रहा है।

भाजपा नेतृत्व ने उन पर भरोसा करके राज्य का नेतृत्व उन्हें सौंपा। भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ा कि झारखंड में केवल आदिवासी ही मुख्यमंत्री हो सकते हैं, जनसामान्य के द्वारा इसकी प्रशंसा भी की गई, लेकिन धीरे-धीरे राज्य के मुख्यमंत्री कुछ नौकरशाहों और छुटभैया नेताओं से घिर गए और आत्ममुग्धता के शिकार हो गए। उनकी भाषा और आचरण से पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी ठेस पहुंची। बीच-बीच में उनके विरुद्ध पार्टी के अंदर खाने से आवाज तो उठती रही किंतु विगत कुछ दिनों में पार्टी के विधायक और मंत्री इनके क्रियाकलाप को लेकर इतने असंतुष्ट हो गए कि पार्टी अनुशासन का डर छोड़ कर सरकार और पार्टी के विरुद्ध खड़ा होने में जरा सा संकोच नहीं किया और अब हालात कुछ और ही कह रहे हैं। ऐसे नाजुक समय में पार्टी नेतृत्व क्या फैसला लेता है, यह तो कहना थोड़ा मुश्किल होगा, लेकिन आगामी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव के पूर्व अगर अनुशासित फैसले नहीं किए गए तो पार्टी को बड़े नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष दो बार झारखंड का दौरा कर चुके हैं और दोनों ही बार उन्होंने संघ, सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बैठा कर चलने की नसीहत भी दी थी, लेकिन कई विधायक कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने इस तालमेल को बिगाड़ दिया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि संवादहीनता की ही स्थिति को देखते हुए संघ ने भी CM के खिलाफ अपनी रिपोर्ट केंद्र को भेजी थी।

हालांकि सार्वजनिक मंच से माननीय प्रधानमंत्री ने झारखंड के विकास की तारीफ कई बार की है। लेकिन जो विकास के आंकड़े नौकरशाहों के द्वारा तैयार किए गए हैं, उनका वास्तविक स्वरूप और जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। विगत दिनों कौशल विकास के नाम पर इस राज्य के युवाओं को जैसे दिग्भ्रमित किया गया, वे अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। 4000 से 8000 नौकरी दिलाने के नाम पर नियुक्ति पत्र दिया गया और उन्हें इसी वेतनमान पर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक आदि राज्यों में भेज दिया गया। इस बाजीगरी के पीछे वैसे लोगों का हाथ है जो कौशल विकास के नाम पर करोड़ों रुपया डकार कर बैठे हैं और उनके माथे पर एक बड़े अधिकारी का वरदहस्त प्राप्त है। ऐसे में इसे कौन सा विकास कहा जाए। वास्तविक या काल्पनिक या सिर्फ कागजी। राजनीतिक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि इस प्रकार के हालात के पीछे सिर्फ सत्ता का अहंकार है और कुछ नहीं। सरयू राय जैसे वरिष्ठ नेताओं का एक तरह से यह अपमान ही है कि व्यवस्था बदलने के बदले व्यक्ति को ही बदल दिया जाए। लोग स्तब्ध हैं, आने वाले घटनाक्रम को पार्टी कैसे हैंडल करती है, यह भविष्य के गर्भ में छुपा है, हो सकता है कि सरयू राय को अपना मंत्रिमंडल भी गंवाना पड़े या फिर बड़े फैसले के शिकार स्वयं मुख्यमंत्री हो जाएं और पार्टी अपना लाज बचाने के लिए विधायकों के दबाव में नेतृत्व परिवर्तन कर दे। यक्ष प्रश्न यह है कि यदि नेतृत्व परिवर्तन किया भी जाता है तो अगला वजीर कौन होगा!

इस पर सस्पेंस बना हुआ है क्योंकि भाजपा के पास राज्य स्तर का कोई ऐसा जनाधार वाला नेता नहीं है। यदि पार्टी अर्जुन मुंडा पर दांव खेलती है तो उनके साथ दिक्कत यह है कि वह किसी सदन के सदस्य नहीं हैं, ऐसे में आदिवासी वोटबैंक साधने के लिए पार्टी किसी वैसे आदिवासी नेता को नेतृत्व दे सकती है जो जनता के बीच पार्टी के एजेंडे को तरीके से रख सकें वरना OBC आरक्षण को लेकर धीरे-धीरे जो आग सुलग रही है, वह पार्टी के लिए वाटर लू साबित हो सकती है।

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