सरयू की विपरीत धारा साधने में विवश रघुवर

-बस गिरने ही वाली रघुवर सरकार.....
कुमार कौशलेन्द्र

सरयू और रघुवर के संबंध धर्म ग्रंथो में असीम श्रद्धा भक्ति के उदाहरणों से भरे पड़े हैं किन्तु झारखण्ड में जो राजनीतिक परिदृश्य बन रहे हैं उसमें मुख्यमंत्री रघुवर दास, सरयू राय की उल्टी धारा से त्राहिमाम की मुद्रा में दिख रहे हैं. अलाकमान रघुवर दास से नाराज...संगठन का मिजाज टटोलने पहुंचे केन्द्रीय पदधारी...दिल्ली दरबार पहुंचे सरयू...प्रदेश भाजपा संगठन में असंतोष...किसी की नहीं सुनते मुख्यमंत्री...नौकरशाही सरकार पर हावी...संघ की नजर में खटकने लगे हैं रघुवर...आदि..आदि के इर्द-गिर्द घूमती खबरों के बीच 3 साल पूरे कर चुकी सूबे में सत्तारूढ़ रघुवर दास के नेतृत्व वाली सरकार की विदाई कथा बांचने वाले बुद्धिजीवी फ़िलहाल 2019 में भाजपा की जय-पराजय का जोड़-घटाव परोसने में लगे हैं.

इन सब के बीच बतौर मंत्री रघुवर सरकार में शामिल सरयू राय के अपनी ही सरकार को नीतिगत मुद्दों पर घेरते रहने की कवायद मुख्यमंत्री के लिये गले की हड्डी बनती जा रही है. अपने गठन के बाद से ही झारखंड राजनीतिक भ्रष्टाचार को लेकर सुर्खियों में रहा. विगत 17 सालों में स्थानीय जनता का जीवन भले ही अपेक्षित बदलाव का साक्षी ना बन पाया लेकिन यहां के मंत्रियों-विधायकों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली. जिनके पास लाख रुपए नहीं थे, वे अरबों के मालिक बन बैठे. हालांकि रघुवर दास की सरकार और उसके मंत्री भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष आरोपों से बचे रहे किन्तु मंत्रिमंडल सहयोगी सरयू राय अपनी ही सरकार के विपक्ष की भूमिका निभाते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर बाकी नहीं रहने दे रहे.

ख़बर तलाशने में लगे मीडियाकर्मियों के लिए हॉट केक बने आंकड़ों और दस्तावेजों के बाजीगर श्री राय को लेकर आम जन यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सत्ता पक्ष के मंत्री हैं अथवा नेता प्रतिपक्ष. निःसंदेह अपनी ही सरकार को झेंप में डालने वाले सरयू राय मुद्दा तलाशने में जुटे विपक्ष के लिए जाने अनजाने मददगार ही साबित हो रहे हैं. रघुवर सरकार की नुक्ताचीनी में जुटे लोगों के बीच भी यह चर्चा गरमाया रहता है कि आखिर सरयू की विपरीत धारा को साधने में क्यों मुख्यमंत्री असहाय दिखते हैं?

विगत दिनों खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने कार्य विभागों द्वारा योजनाओं की विस्तृत सूचनाएं अपलोड नहीं करने के मामले में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा. उन्हें बताया गया कि मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव ने पथ विभाग सहित भवन निर्माण, जल संसाधन, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, कृषि विभाग, कृषि एवं पशुपालन व ऊर्जा विभाग को पत्र लिख कर योजनाओं की विस्तृत जानकारी सरकार की वेबसाइट पर अपलोड करने को कहा था, पर ये सूचनाएं उपलब्ध नहीं करायी गयी. यहां तक कि लंबे समय तक इन निर्देशों का पालन नही करनेवालों पर कार्रवाई नहीं होना, समझ से परे व रहस्यमय है. मंत्री श्री राय ने लिखा कि पथ विभाग में गत चार-पांच वर्षों में बने व निर्माणाधीन पथों का ट्रैफिक सर्वे, एक्सल लोड सर्वे, लोड कैरिंग कैपिसिटी की गणना व मिट्टी जांच की रिपोर्ट देख लेने पर सड़कों के रोड क्रस्ट डिजाइन व निर्माण की गुणवत्ता पता चल जायेगा. हेराफेरी होने पर बात सामने आ जायेगी. यही वजह है कि आदेशों का पालन नहीं हो रहा है.

श्री राय ने लिखा कि भवन सचिव व विकास आयुक्त की अनुशंसा पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने टेंडर निष्पादन में अनियमितता के मामले पर संबंधित अभियंता व मुख्य अभियंता पर कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन ये अभियंता अभी भी भवन विभाग में सर्वेसर्वा बने हुए हैं. अभियंता प्रमुख सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं. यही स्थिति पथ निर्माण व ग्रामीण कार्य विभाग में शीर्ष पदों पर है. वरीयता क्रम में काफी नीचे होने के बावजूद यह समूह एक साथ कई महत्व वाले पदों पर लंबे समय से है. मंत्री ने लिखा कि विधानसभा की प्रत्यायुक्त विधान समिति का वर्ष 2013-14 का प्रतिवेदन पांच मार्च 2014 को उपस्थापित किया गया. इस पर विचार करना जरूरी है. समिति ने पाया कि भवन विभाग में टेंडर मैनेज किया जा रहा है और अभियंता प्रमुख के तकनीकी सचिव रास बिहारी सिंह की भूमिका संदेहास्पद है. उन्होंने टेंडर मैनेज किया. ऐसे में उनकी संपत्ति की जांच निगरानी विभाग तीन माह के अंदर करें और दोषी को दंडित करें. साथ ही इसकी जांच भी की जाये कि तत्कालीन प्रधान सचिव ने इन्हें संरक्षण क्यों दिया. आज भी यह व्यक्ति पथ निर्माण विभाग का सर्वेसर्वा बना हुआ है. मंत्री ने आगे लिखा कि समिति ने सूचनाएं मांगी थी, पर सूचनाएं नहीं दी गयी. बार-बार स्मारित करने के बाद भी तत्कालीन प्रधान सचिव राजबाला वर्मा न तो समिति की बैठक में आयीं और न ही सूचनाएं भिजवायी. मंत्री ने लिखा कि विभागीय गड़बड़ियों को छुपाने के लिए ऐसा जानबूझ कर किया गया. समिति ने पाया कि भवन विभाग में टेंडर मैनेज किया जाता है.

श्री राय ने झारखंड में इंडस इंड बैंक की गतिविधियां और सूबे की पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा द्वारा पहुंचाए फायदे को लेकर कई सनसनी खेज सवाल खड़े किए. खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने इंडस इंड बैंक मामले से लेकर चारा घोटाला, आधार के बिना राशन कार्ड से वंचित कर दिए गए लाखों लोगों का हवाला देते हुए पूर्व मुख्य सचिव पर तीखा प्रहार किया. मंत्री सरयू राय इतने पर ही नहीं रूके बल्कि उन्होंने चारा घोटाला मामले में भी सीबीआई की जांच में राज्य की पूर्व मुख्य सचिव को दोषी बताए जाने का जिक्र कर यहां तक कह दिया कि मुख्य सचिव के सेवानिवृत्ति से पहले कार्रवाई हो जानी चाहिए. हालांकि हुआ वही जो सरकार चाहती थी लेकिन विवादों की फजीहत के साथ. 
ज्ञातव्य है कि यह पहली बार नहीं है कि जब कैबिनेट के सदस्य रहते हुए सरयू राय ने सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को सवालों के घेरे में लिया है. विगत दिनों श्री राय ने सेवानिवृत हो चुकी मुख्य सचिव राजबाला वर्मा से सम्बंधित एक विज्ञप्ति को आधार बना कर मुख्यमंत्री के अधीनस्थ सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारीयों और कर्मचारियों पर स्वेच्छाचारिता का आरोप मढ़ते हुए कार्रवाई का पत्र मुख्यमंत्री को लिखते हुए मीडिया को भी जारी कर दिया.

पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के बहाने खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने अपनी ही सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए. मुख्यमंत्री रघुवर दास को कड़ा पत्र लिखकर उन्होंने मंत्रिपरिषद की पिछली बैठक के बाद प्रेस ब्रीफिंग में पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को कुशल प्रशासक बताते हुए उनके कार्यकाल की प्रशंसा का विरोध करते हुए कहा कि बैठक में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं. उल्लेखनीय है कि राय ने बैठक के बाद भी इस पर अपनी आपत्ति जाहिर कर दी थी. अब उन्होंने इसे मुद्दा बनाते हुए न सिर्फ ब्रीफिंग पर सवाल उठाया है, बल्कि कार्रवाई की भी मांग की है. उन्होंने इस बहाने राजबाला वर्मा पर भी तीखा हमला बोला है. राय लिखते हैं-राजबाला वर्मा का पूरा करियर विवादास्पद रहा है. उन्होंने माफिया कार्यसंस्कृति को बढ़ावा दिया, फिर उनके कार्यकाल का महिमामंडन क्यों? राय के अनुसार एक विवादास्पद अफसर के बारे में ऐसी बातें प्रचारित करना और उसे कैबिनेट के फैसले से जोड़ना घोर आपत्तिजनक और मंत्रिपरिषद की भावना के प्रतिकूल है.

बताते चलें की कर्मचारियों और अधिकारीयों की घोर किल्लत झेल रहे सूचना व जनसंपर्क विभाग के निदेशालय में ही गिनती के पदाधिकारी और कर्मचारी तैनात हैं. प्रमंडलों और जिलों का हाल तो और भी बदतर है. प्रभार व् जुगाड़ के बूते कार्यनिष्पादन की नौबत है. संशाधन संपन्न और आइएसओ प्रमाणित होने के बावजूद पूर्णकालिक निदेशक और उपनिदेशकों व सहायक निदेशकों की कमी के बीच चल रहे राज्य सरकार के इस महत्वपूर्ण विभाग में कार्याधिक्य का खामियाजा मीडिया को भी भुगतना पड रहा है. विज्ञापन निर्गम, भुगतान व प्रचार प्रसार के कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं. उस पर से मुल्लमा-अपनी ही कैबिनेट के मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री के अधीनस्थ सूचना जनसंपर्क विभाग की कार्यशैली पर प्रश्न खड़ा खड़े करना, मुद्दा गंभीर तो है ही.

पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा के वरिष्ठ नेता अर्जुन मुंडा ने कहा कि सरयू राय मंत्री परिषद के सदस्य हैं, वे जो देख रहे हैं वही बोल रहे हैं. सरकार को उनकी बातों पर गंभीरता दिखानी चाहिए. वे देवघर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि राजबाला वर्मा को सीएम रघुवर दास की ओर से क्लीन चिट दिये जाने के मामले में मंत्री सरयू राय के मीडिया में आये बयान पर सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि वह इस पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट करे. मंत्री को अपनी बात रखने का अधिकार है. सरकार को मंत्री परिषद के सदस्य से वार्ता कर जनता को बताना चाहिए. उन्होंने कहा कि सरकार के मसले पर वे कोई टिप्पणी नहीं करते हैं. जनहित का मुद्दा रहता है तभी बोलते हैं. सरकार जनहित में काम कर रही है. वैसे संगठन पर इस तरह की बातों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है. सरकार व संगठन के अलग-अलग काम हैं.

नौकरशाही और अपनी ही व्यवस्था पर प्रश्न खड़े कर सरयू राय भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान सरकार का कितना हित और अहित कर रहे हैं यह तो भाजपा नेत्रित्व के चिंतन का विषय है किन्तु इतना तो तय है कि जनता भ्रमित हो रही है कि सरयू राय को सतापक्ष का माने या प्रतिपक्ष का. इन सब के बीच गौण हो चुके कई अहम मुद्दे जिनका दंश यह प्रदेश अपने गठन कल से ही झेलता रहा है को सुलझाने में जुटे मुख्यमंत्री श्री दास की सरयू के मुद्दों पर बेबसी चर्चा का कारक तो बन ही रहा है. अपने ही सहयोगी मंत्री की उलटबांसी के आगे मुख्यमंत्री का मौन न तो सरकार की सेहत के लिये ठीक दिखता है और ना ही भाजपा के अगामी चुनावी रण के लिये.

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