विश्वास, आशुतोष पर भारी पड़े संजय

आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने तीन उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. इसके साथ ही लंबे समय से बना उहापोह खत्म हो गया. आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने अपने नेता संजय सिंह के साथ नारायण दास गुप्ता और सुशील गुप्ता को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है. इन सबके बीच संजय सिंह को राज्यसभा में जाने का मिला अवसर कई सियासी समीकरण को जन्म देगा. आम आदमी पार्टी के गठन के समय से ही संजय सिंह पार्टी के मजबूत स्तंभ बनकर उभरे हैं. जनलोकपाल आंदोलन के समय से ही संजय सिंह केजरीवाल के साथ हैं. अगर ये कहा जाए कि पार्टी में केजरीवाल और सिसोदिया के बाद उनका नंबर है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

अब तक के अपने करियर में कभी चुनाव नहीं लड़ने वाले संजय सिंह पार्टी के लिए तीन चुनावों में कैंपेन कमिटी के इंचार्ज रहे हैं. उन्हें पार्टी में 'संकटमोचक' की संज्ञा दी गई है, जब-जब पार्टी में संकट की स्थिति आई है, संजय सिंह विघ्नहर्ता के तौर पर उभरे हैं. उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के रहने वाले संजय सिंह के पिता पेशे टीचर थे, लेकिन संजय सिंह की कभी पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं रही. हाईस्कूल (10वीं) में संजय सिंह एक बार फेल हो गए थे. शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद संजय सिंह ने ओडिशा के माइनिंग इंजीनियरिंग स्कूल से डिप्लोमा किया. हालांकि इस विषय पर काफी झमेला है. कुछ लोग कहते हैं कि संजय सिंह ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की. पार्टी की ओर से भी उन्हें मैकेनिकल इंजीनियर ही बताया गया है. ओडिशा में रहने के दौरान संजय सिंह ने उड़िया भाषा सीख ली और राज्य भर में घूमे. ओडिशा के साथ उनका जुड़ाव बढ़ता गया. इसी दौरान क्योंझर में उन्होंने एक छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया. ये उनके आंदोलनकारी जीवन की पहली शुरुआत थी और NGO सेक्टर में उनकी एंट्री भी.

पढ़ाई पूरी करने के बाद संजय सिंह ने नौकरी शुरू की, लेकिन उनका मन नहीं रमा. 1994 में उन्होंने सुल्तानपुर समाज सेवा संगठन की स्थापना की. इसके तहत गरीबों और जरूरतमंदों के लिए काम करना शुरू किया. ब्लड डोनेशन और हेल्थ कैंप के साथ जगह-जगह कैंप लगाकर जागरूकता फैलाने का काम करने लगे. उनके दोस्तों के मुताबिक सामाजिक स्तर पर जागरूकता फैलाने के लिए संजय सिंह साइकिल से कई-कई किलोमीटर साइकिल यात्रा करते थे. संजय सिंह ने करीब 16 साल तक फुटपाथ पर रहने वाले लोगों और फेरीवालों के लिए काम किया. इसी दौरान वे सामाजिक कार्यकर्ता रघु ठाकुर से मिले. संजय सिंह ने इसके अलावा 'आजाद सेवा समिति' में भी काम किया, जो बाद में नेशनल हॉकर्स एसोसिएशन का हिस्सा बनी.

साल 2007 में संजय सिंह के जीवन में बड़ा बदलाव आया. इसी साल संजय सिंह ने कोका कोला के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया. इस दौरान उनकी मुलाकात मेधा पाटकर और असगर अली से हुई. इससे पहले 2006 में केजरीवाल ने सूचना के अधिकार को लेकर अभियान की शुरुआत की. यह संदीप पांडे ही थे, जिन्होंने केजरीवाल को संजय सिंह का नाम सुझाया. हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि कुमार विश्वास ने संजय सिंह को अरविंद केजरीवाल से मिलवाया था. अरविंद केजरीवाल मनोज तिवारी की गाड़ी में बिठाकर संजय सिंह को रामलीला मैदान ले गए थे. संजय सिंह हमेशा से राजनीति में फुलटाइमर होना चाहते थे. राज्यसभा जाना उनकी बड़ी कामयाबी है. संजय सिंह ने शुरू से केजरीवाल को अपना नेता माना. इसका प्रसाद भी उन्हें राज्यसभा टिकट के रूप में मिला है.

संजय सिंह इंडिया अंगेंस्ट करप्शन के दौरान अन्ना हजारे से भी जुड़े लेकिन आम आदमी पार्टी के गठन के बाद अरविंद केजरीवाल का हाथ पकड़ लिया. धीरे-धीरे केजरीवाल के साथ उनका रिश्ता मजबूत होता गया. इसका सबूत ये है कि संजय सिंह पार्टी की PAC और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में हैं, विधानसभा चुनावों के दौरान पंजाब के प्रभारी रहे. यूपी और बिहार के राजनीतिक मामलों के प्रभारी रहने के साथ वे पार्टी के प्रवक्ता भी हैं.इससे पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान दिल्ली इलेक्शन कैंपेन ग्रुप के कोर मेंबर रहे.

संजय सिंह गोमती नदी को श्रमदान के जरिए साफ करने का अभियान भी चला चुके हैं. साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गोमती की सफाई के लिए बनाए गए 'क्लीन गोमती प्रोजेक्ट' में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का हिस्सा रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ 'महाभारत' में अरविंद केजरीवाल के 'संजय' रहे सिंह कभी सपा के सुल्तानपुर से विधायक रहे अनूप संडा के खास थे. संडा अब विधायक भी नहीं हैं, लेकिन संजय सिंह राज्यसभा की तैयारी में हैं.

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