बिहारियत जीती, केन्द्रीय विश्वविद्यालय के दोनों बर्खास्त शिक्षकों की हुई वापसी

कुलपति के विरोध में आन्दोलन के बाद नींद से जागी कार्यपालक समिति
राकेश कुमार

आखिर में जीती बिहारियत| जीता सच| अन्याय के खिलाफ चले आन्दोलन को मुकाम मिला| 28 सितम्बर से महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के कुलपति डॉ अरविन्द अग्रवाल के खिलाफ जारी आन्दोलन के चलते गलत ढंग से बर्खास्त दो शिक्षकों को वापस जॉब में ले लिया गया है| इस मामले में जन दवाब के चलते केन्द्रीय मंत्री भी वीसी की गलती को नहीं छुपा पाए| 16 अक्टूबर को पटना के विंडसोर होटल में एक्सक्यूटिव कमिटि ( कार्यपालक समिति ) की बैठक बुलाई गई और दोनो बर्खास्त शिक्षकों को वापस अपने पद पर बहाल कर दिया गया।

दो शिक्षकों डॉ रे और डॉ अमित रंजन की गलत बर्खास्तगी के विरोध में बापू की कर्मभूमि चम्पारण की धरती पर महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक लगातार सत्याग्रह पर रहे। दो शिक्षकों की बर्खास्तगी के बाद आन्दोलित हुये शिक्षकों और छात्रों को स्थानीय लोगों के साथ विभिन्न संगठनों का भी समर्थन मिला और परत दर परत विश्वविद्यालय में हुये धोटालों और मनमानी का राज खुलता गया।

 

बर्खास्तगी मामले में वीसी लगातार अपने बयान बदलते रहे। पहले पत्र में कहा गया कि अधिशासी समिति द्वारा 27 सितम्बर की बैठक में कार्य की समीक्षा के दौरान इन दोनों शिक्षकों को महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया गया है। बाद में बताया गया कि वर्ग में विलम्ब से आने और नियमों के पालन में लापरवाही के आरोप में इन्हें हटाया गया है।

मोतिहारी में स्थापित महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय स्थापना काल से हीं विवादों में घिरा रहा है। कुलपति डा0 अरविन्द अग्रवाल के व्यवहार को लेकर इनका कभी नेताओं से तो कभी बुद्धिजीवियों और पत्रकारों से विवाद होता रहा है। शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों की बहाली में धांधली और नियमों को दरकिनार करके अपने चहेतों को नियुक्त करने का आरोप लगता रहा। क्षेत्रियता को बढावा देने, खुलेआम बिहारियों को विश्वविद्यालय से बाहर खदेड देने, असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग, महिला कर्मियों से र्दुव्यवहार की शिकायत करवाने का भय दिखाकर इस्तीफा ले लेने जैसा आरोप कुलपति पर लगता रहा है। लेकिन पावर, राजनैतिक पहुंच की बदौलत ये बातें विश्वविद्यालय परिसर में हीं दब के रह जाती थीं। इसके पूर्व भी एक असिस्टेन्ट प्रोफेसर डा0 संदीप कुमार को भयाक्रांत कर उनसे जबरन इस्तीफा लेकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।

वस्तुतः केन्द्रीय विश्वविद्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार को दबाने के लिये सोची-समझी रणनीति के तहत स्थानीय लोगों को हटाने की साजिश चल रही है। इस पूरे खेल में कुलपति डा0 अग्रवाल के मुख्य सहयोगी डा0 आशुतोष प्रधान और डा0 दिनेश हुड्डा बताये जाते हैं। इन दोनें को कुलपति अपने पूर्व के कार्यस्थल हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय से लाये हैं। हिमाचल प्रदेश के विवि में भी डा0 अग्रवाल के मनमाने निर्णय और कपटी व्यवहार के किस्से आम हैं। ऐसे में कुछ राजनेताओं और केन्द्रीय मंत्री की छत्रछाया में डा0 अग्रवाल निरंकुश होते चले गये।

डा0 अग्रवाल के निकटस्थ सहयोगी डा. आशुतोष प्रधान की डॉक्टरेट की डिग्री पर भी जांच चल रही है। इन्होंने लाडनू राजस्थान के निजी संस्थान जैन विश्वभारती संस्थान से पढाने के दौरान पीएचडी की डिग्री हासिल की। यूजीसी के नियमों के विरूद्ध गलत तरीके से डिग्री प्राप्त करने के आरोप है इनपर।

नियुक्ति के अलावा पुस्तकालय की पुस्तक खरीद में घोटाला हुआ। महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के लिये विगत दिनों लगभग दो करोड के पुस्तकों की खरीदगी की गई है। जिसमें कमीशन का खेल खुलेआम चला है। कई विभागों के लिये ऐसी पुस्तकों को मंगाया गया है जो अनावश्यक हैं।

’कैंपस में हमेशा दो कौवों को टंगा रहना चाहिये ताकि अन्य कौवों को सबक मिले’ यह है डा0 अग्रवाल और उनके दोनों सहयोगी डा0 प्रधान और डा0 हुड्डा का तकियाकलाम | लेकिन इस बार यही रवैय्या इनपर भारी पड़ा| बर्खास्त दोनो शिक्षकों के पक्ष में छा़त्र संगठनों के साथ हीं विश्वविद्यालय के अन्य कार्यरत शिक्षक भी आ गये हैं। 3 अक्टुबर को दर्जनों शिक्षकों धरना पर बैठ गये। विश्वविद्यालय के 72 में से 37 शिक्षक खुल कर सामने आ गये हैं जिसमें अतुल त्रिपाठी, ओम प्रकाश गुप्ता, पंकज कुमार सिंह, संजय कुमार, श्रीधर सत्यपाल, विद्युभूषण मिश्रा, प्रतिभा सिंह, स्वाति मनोहर, बबिता मिश्रा, अभिजीत कुमार, श्यामनंदन सिंह, विपिन कुमार, आलोक श्रीवास्तव, अनिल कुमार सिंह सहित अन्य शामिल हैं। धरना पर बैठे शिक्षकों के अनुसार कुलपति के कुछ चहेतों को छोडकर सभी कुलपति के नादिरशाही रवैया के विरोध में हैं। बिहार विवि के सीनेट मेम्बर और अभाविप के नेता नीरज कुमार ने बताया कि कुलपति आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं| चम्पारण विकास मोर्चा के संयोजक राय सुन्दरदेव शर्मा ने भी चरणबद्ध आन्दोलन का ऐलान किया, जिसमें अभिभावकों का भी समर्थन रहा है। बोस्टन के हार्वर्ड विवि के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर विरोध प्रदर्शन किया है। हार्वर्ड के वैज्ञानिक डा0 अमरेन्द्र कुमार अजय, डा0 अभिज्ञान सत्यम, डा0 राजेश कुमार, डा0 मनोज गुप्ता, डा0 प्रेमस्वरूप यादव और डा0 परमीत तेरेसा ने तख्ती लगाकर विरोध प्रदर्शन किया। पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री अखिलेश प्रसाद सिंह ने भी चिन्ता जताते हुये कुलपति पर कार्यवाही की मांग की है। जन अधिकार पार्टी के प्रमुख और सांसद पप्पू यादव ने भी केविवि के कुलपति के विरोध में आन्दोलन कर रहे छात्रों के समर्थन में मोतिहारी में कार्यक्रम किया|

16 अक्टूबर को पटना के विंडसोर होटल के कमरा नम्बर 206 में कार्यपालक समिति की बैठक हुई। कुल आठ सदस्यों के बीच बर्खास्त शिक्षकों का मामला रखा गया। गहरा विचार विमर्श हुआ। बैठक में कई सदस्यों ने कुलपति को आडे हाथ लिया। और मनगढंत कारणों से दोनों शिक्षकों की बर्खास्तगी को वापस लेते हुये पुनः योगदान देने का आदेश दिया। हालॉकि कुलपति पुनः दोनो शिक्षकों को प्रोबेसन पर रखना चाहते थे लेकिन समिति के सदस्यां का कहना था कि दोनों के प्रोबेशन का एक वर्ष पूरा हो चुका है। अब दोनो को नियमित रूप में लिया जाये और बीच के रिक्त कार्य दिवस को भी नियमित किया जाये।

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