वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा

भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में संविधान से पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया। संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों/ सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में स्ष्ट को 15 प्रतिशत एवं स्ञ्ज को 7.5 प्रतिशत का आरक्षण रखा। लेकिन भारत में पिछड़े वर्गों की अधिकांश आबादी की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। बावजूद इसके संविधान निर्माताओं ने इनके लिए 1950 में आरक्षण का प्रावधान नहीं रखा। आजादी के पूर्व विंध्य के दक्षिण में प्रेसिडेंसी क्षेत्रों में रियासतों के बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में छत्रपति शाहूजी महाराज ने पिछड़े वर्गों की गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उनको हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी।

पिछड़े वर्गों का आंदोलन सबसे पहले दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में जोर पकड़ा। उन सुधारकों में मलई श्रीनिवासन पेरियार, जोगीदास पेरियार, ज्योतिबा फुले, बाबा साहब अंबेडकर, छत्रपति शाहू जी महाराज एवं अन्य थे। वर्ष 1953 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग का गठन किया गया लेकिन उनके द्वारा अन्य पिछड़ी जातियों के लिए किए गए सभी सिफारिशों को सरकार ने अस्वीकार कर दिया। यद्यपि की जातियों के अनुसूची को वर्ष 1956 में उसी रिपोर्ट के आधार पर संशोधन किया गया। वर्ष 1979 में बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण पुन: पिछड़े वर्ग के मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग का गठन किया गया। आयोग ने भारत की जनगणना 1930 का आधार मानते हुए 53 प्रतिशत आबादी का मूल्यांकन किया तथा 1980 में 22 प्रतिशत से 49.5 प्रतिशत तक आरक्षण की सिफारिश की।

वर्ष 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकारी नौकरियों, सार्वजनिक उपक्रमों, वित्त प्राप्त शिक्षण संस्थानों में लागू कर दिया। 27 प्रतिशत पिछड़ों के आरक्षण का मामला राष्ट्रीय मुद्दा बना अनेकों छात्र संगठनों ने उसका विरोध किया यहां तक कि कई छात्रों ने आत्मदाह भी कर लिया। देश के विभिन्न भागों से आरक्षण के विरुद्ध मामले न्यायालय में दर्ज हुए। वर्ष 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोगा न्यायालय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सही ठहराया। बाद में अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया। 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं हो सकता है। सर्वोगा न्यायालय के इस फैसले से सबको समान अधिकार के संविधान की गारंटी का उल्लंघन होगा, हांलाकि राज्य सरकारों ने इस 50 प्रतिशत की सीमा को पार कर दिया है सर्वोगा न्यायालय में जिस पर मुकदमे चल रहे हैं। उदाहरण के लिए जाति आधारित आरक्षण भाग 69 प्रतिशत और तमिलनाडु के करीब 85 प्रतिशत जनसंख्या पर लागू होता है।

राजस्थान में 68 प्रतिशत आरक्षण लागू है। विदित हो कि इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अति पिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी बाधा नहीं है। अत: राज्य सरकारें ऐसा करना चाहें तो कर सकती हैं तब भारतीय राजनीति में आरक्षण इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि इसके जिक्र मात्र से सरकारें बन बिगड़ जाती हैं। ऐसे में ह्रक्चष्ट के अंदर ही वर्गीकरण की मांग लगातार की जा रही है और अब तक 10 राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पांडिचेरी, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु ने पहले ही ओबीसी वर्गीकरण को लागू कर दिया है। मंडल आयोग की सिफारिशों का उद्देश्य आरक्षण के जरिए सामाजिक न्याय के लक्ष्य को पूरा करना था।

जहां देश के कई राज्यों ने ओबीसी वर्ग के अंदर वर्गीकरण करते हुए 50 प्रतिशत की सीमा से आगे जाकर भी आरक्षण की व्यवस्था की, वहीं झारखंड भारत का इकलौता ऐसा राज्य है जहां राज्य निर्माण वर्ष 2000 के पश्चात से पिछड़ा वर्ग को केवल 14 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा है। यानी 17 वर्षों से संपूर्ण राज्य के लगभग 46प्रतिशत आबादी के संवैधानिक अधिकारों का पक्षधर कोई राजनीतिक दल नहीं है। अब धीरे-धीरे पिछड़े समाज से आवाज उठने लगी है क्योंकि अब राजनीतिक दलों को लगने लगा है कि यह मामला गंभीर रूप से समाज के अंदर सुलग रहा है और सुलगे भी क्यों नहीं? आखिर अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित राज्य की आधी आबादी चुप कैसे रह सकती है क्योंकि लोहिया जी कहा करते थे, जिंदा कौमें सरकार बदलने के लिए 5 साल तक इंतजार नहीं करतीं।

झारखंड में ओबीसी आंदोलन

सामाजिक आंदोलन एक प्रकार का सामूहिक क्रिया है। सामाजिक आंदोलन व्यक्तियों का संगठनों के विशाल अनौपचारिक समूह होते हैं जिसका ध्येय किसी विशिष्ट सामाजिक मुद्दे पर केंद्रित होता है। झारखंड में पिछड़ों के आंदोलन का आधार मंडल आयोग द्वारा मिलने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण के विरुद्ध यहां 14 प्रतिशत आरक्षण मिलना ही नहीं बल्कि राज्य के शिड्यूल जिलों में एवं अन्य जिलों में उनके अनुपात की विषमता है। झारखंड राज्य जैसे पिछड़े राज्यों के पिछड़े शोषित एवं अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में इतना अनभिज्ञ हैं जो यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि हमारे साथ हो क्या रहा है अथवा मेरा हित/अधिकार क्या है।

देश के जिन राज्यों में जिला रोस्टर के आधार पर स्थानीय नीति लागू किया गया है वहां की सरकारों ने सभी वर्गों के हितों के संरक्षण और जनसंख्या अनुपात के आधार आरक्षण लागू किया है वहां किसी को भी संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं होना पड़ रहा है मगर 17 वर्षों में झारखंड की सरकारों ने तो सारी हदों को पार कर दिया है। स्थानीय नीति के आधार अधिकांश नियुक्तियों को जिला स्तर पर ही करने का प्रावधान किया गया है यह सच इतना भयावह है कि समाज की आधी आबादी के अंदर इसने ज्वालामुखी भर दिया है जो कभी भी फट सकती है। झारखंड ओबीसी आंदोलन सरकारी नीति या उनके आरक्षण नीति के खिलाफ है लेकिन स्व:स्फूर्त या असंगठित प्रतिरोध की कार्रवाई को सामाजिक आंदोलन नहीं माना जाता। इसके लिए किसी स्पष्ट नेतृत्व और एक निर्णयकारी ढांचे का होना जरूरी है। आंदोलन में भाग लेने वालों के लिए साक्षा मकसद और विचारधारा का होना आवश्यक भी है। क्या यह खूबियां राजनीति के दायरे में काम करने वाले दल या समूह में नहीं ही होती?

दरअसल झारखंड के पिछड़ों ने अपने आंदोलन के बुनियादी चरित्र को समझा ही नहीं है, उनकी गोलबंदी का आकार अभी बड़ा नहीं है लेकिन ऐसे अधिकार वंचित तबकों या समूहों को जब भी एहसास हो जाएगा उसी समय से सामाजिक आंदोलन स्व:स्फूर्त अपना आकार बढ़ा लेगा। हो सकता है कि उन वर्गों के नौजवान सत्ता परिवर्तन के लिए सडक़ों पर अपने वास्तविक स्वरुप के साथ उतर जाएं और शायद वह सरकार को महंगी साबित हो सकती है। ऐसा नहीं है कि झारखंड ऐसा करने वाला पहला राज्य होगा। 70 के दशक में तमाम सामाजिक परिवर्तन के पीछे छात्र आंदोलन हैं, और उससे निकली प्रतिरोध की कार्रवाई का प्रभाव था। एक नए सिद्धांत ने जन्म लिया जिसे रिसोर्स मोबिलाइजेशन थ्योरी (संसाधनों की लामबंदी का सिद्धांत) के नाम से जाना जाता है। आज देश के अधिकांश नेताओं उसी थ्योरी की उपज रहे हैं। आज पुन: झारखंड उसी राह पर चल पड़ा है क्योंकि 50 प्रतिशत आबादी और 14 प्रतिशत आरक्षण, बारूद के ढेर पर बढ़ते राज्य का भविष्य कौन तय करेगा। क्योंकि भारतीय राजनीति का सबसे सफल नारा पुन: अंगडाई ले रहा है। वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा।
साभार राजनीति गुरु पत्रिका

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