पिछड़ों के हक के लिए अब होगी आर-पार की लड़ाई

-यादव महासभा पूरे प्रदेश में पिछड़ों को करेगी गोलबंद
बजरंगी यादव

झारखंड में पिछड़ों की कोई सुनने वाला नहीं है. ऐसे में अब अनुनय-विनय का नहीं, आर-पार की लड़ाई का वक्त है. हमें यह याद रखना चाहिए कि पेट की आग जब दिमाग में चढ़ जाती है, तो उसी समय क्रांति जन्म लेती है. राज्य निर्माण के बाद पिछड़ों के साथ हो रहे अन्याय को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. बहुत हो गई आरजू विनती, अब तक ना सरकार जागी और ना ही उसके रहनुमा और ना ही पिछड़े समाज से आने वाले अग्रणी नेता. अब इस लड़ाई को नौजवान अपने हिसाब से आगे बढ़ाएंगे.

जब बाबूलाल मरांडी इस राज्य के मुख्यमंत्री थे, उस समय अर्जुन मुंडा जी के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया था, उसी समिति ने पिछड़ों के लिए 27 % आरक्षण अर्थात कुल 73 % आरक्षण की व्यवस्था दी थी, लेकिन मामला न्यायालय में लटक गया, लंबे समय तक यह मांग उठती रही कि पूरे देश में जब पिछड़ों के लिए 27 % आरक्षण का प्रावधान है तो झारखंड में केवल 14% आरक्षण क्यों होना चाहिए. यह मामला उलझ गया, नौजवानों के संवैधानिक अधिकार शैक्षणिक अधिकार नौकरियों में मिलने वाले अवसर के अधिकार समाप्त होते गए. 17 साल गुजर गए लेकिन समाज अपना हक ना पा सका.

अनुनय-विनय से नहीं अब आंदोलन से बनेगी बात

उसमें यह प्रावधान है कि राज्य सरकार चाहे तो जनसंख्या और जाति के आधार पर आरक्षण का प्रावधान 50% से ज्यादा कर सकती है, लेकिन पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश को भी सरकार ने नहीं माना. हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, यहां तक कि झारखंड राज्य में जिला स्तरीय आरक्षण के तहत 6 जिले ऐसे हैं, जहां पिछड़ा वर्ग के लिए 0 % आरक्षण है. इस दर्द को समझा जा सकता है, इस नजरिए से भी कि आने वाली पीढ़ी को उनके अधिकारों से समूल वंचित कर देने की साजिश चल रही है. जिला रोस्टर आरक्षण का जो प्रावधान वर्तमान सरकार ने लागू किया है, उसमें तृतीय और चतुर्थ वर्ग के सभी पदों पर जिलास्तर पर ही नियुक्ति की जाएगी. अब इसके दूसरे पहलू को समझा जाए तो क्या किसी पिछड़े नौजवान का मन इस अन्याय को देखकर विचलित नहीं होगा. किसने किया ऐसा फैसला ! क्या इस राज्य की आधी आबादी इस तुगलकी फरमान से अपने अधिकार से वंचित हो जाए, उसके अधिकार यूं ही मारे जाएं, और सभी लोग चुप हैं. ऐसा कब तक चलेगा !

मैंने इस मुद्दे पर समाज के अलग-अलग हिस्से के लोगों से बात की. नौजवानों से मिला तो पाया कि आरक्षण और अपने अधिकार के लिए समाज के सभी तबके, खासकर नौजवान इस लड़ाई को आर-पार की लड़ाई बनाना चाहते हैं. यह मामला राजनीतिक नहीं है, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है और सामाजिक आंदोलन जब भी हुए हैं, एक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सदैव सफल रहे हैं.

अगले कुछ दिनों में मैं इस मुद्दे को स्कूलों-कॉलेजों, गांव-गांव के नौजवानों एवं पिछड़े वर्ग के प्रबुद्ध लोगों के बीच ले जाऊंगा और उनसे यह अपील करुंगा कि पिछड़ा समाज अपने ऊपर अत्याचार को अब बर्दाश्त नहीं करेगा. हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश होगी कि तस्वीर बदलनी चाहिए.
(लेखक झारखंड यादव महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष हैं)
साभार राजनीति गुरु पत्रिका

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