कई फैसलों से घिर गई रघुवर सरकार

रघुवर सरकार की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, सरकार ने भले ही तीन साल पूरे कर लिए, उपलब्धियों की ढेर लगा दी. लेकिन बहुमत वाली यह एनडीए सरकार राजनीतिक रूप से लगातार हारती दिख रही है। सरकार के मुखिया की कार्यशैली से विपक्ष की नाराजगी तो समझी जा सकती है पर सरकार के ही मंत्री और विधायक जब दो-दो हाथ करने के मूड में आ जाएं तो ये सरकार सहित पार्टी के लिए भी खतरे की घंटी है।

स्थानीय नीति पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं, उधर भूमि अधिग्रहण बिल, सीएस, डीजीपी, एडीजी के मामले को लेकर सदन में बने गतिरोध से सरकार की जमकर किरकिरी हुई है। जानकारों की मानें तो इन सब के पीछे सरकार के स्तर पर बनी संवादहीनता ज्यादा जिम्मेवार है। कहा जा रहा है कि दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बात सुनी नहीं जा रही. बताया जा रहा है कि सरकार अपने विधायकों को भी किसी निर्णय का हिस्सा नहीं बनाती है, जिसके कारण जनता के बीच इन जनप्रतिनिधियों की खूब फजीहत होती है।

हालांकि इस संवेदनहीनता से संबंधित सभी दस्तावेज पार्टी आलाकमान को भी कई बार भेजे गए हैं, पर उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, विधायकों को अपनी खिसकती जमीन की चिंता सताने लगी। इसीलिए सत्तापक्ष के ही दो दर्जन से ज्यादा विधायकों ने मुख्यमंत्री को स्थानीय नीति के मुद्दे पर पत्र लिखा।

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