ट्विटर, CS और जांच की गति पर सवाल!

मनोज कुमार सिंह
बजट सत्र के दौरान लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेता राज्य की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के खिलाफ सदन के भीतर और सदन के बाहर उन पर कारवाई करने के लिए लगातार आवाज उठाते रहे, काफी हो- हल्ला के बाद मुख्यमंत्री द्वारा CS के विरुद्ध स्पेशल ब्रांच से जांच कराने का आश्वासन दिया गया । स्पेशल ब्रांच की टीम ने इंडसइंड बैंक के तत्कालीन कारपोरेट हेड अद्वैत हेबर से पूछताछ किया तो हेबर ने कहा कि उन्होंने झारखंड के संदर्भ में कोई भी ट्वीट नहीं किया था, उनका यह सामान्य ट्वीट था । उन्होंने यह भी कहा यह 5 माह पहले का मामला है और मैंने मुख्य सचिव से इस विषय पर माफी भी मांग लिया था । आगे उन्होंने यह भी कहा यदि CS को इस पर भी आपत्ति है तो वह पुनः माफी मांगने के लिए तैयार है।

जिस बयान पर पिछले दिनों हंगामा खड़ा किया गया, उस ट्वीट को करने वाला अपने बयान से पीछे हट रहा है। जांच के इस घटनाक्रम कि इनसाइड स्टोरी से यह स्पष्ट हो रहा है कि जांच के पहले जिन मुद्दों पर संदेह व्यक्त किया गया था, परिणाम उसी के अनुरूप दिखने लगे हैं। इस जांच का एक पहलू यह भी है कि राज्य के छोटे नौकरशाह अंदर ही अंदर काफी खुश हैं कि यदि मैं भी सत्ता का विश्वासपात्र बना रहा तो लाख विरोध के बावजूद भी मेरा परिणाम भी ऐसा ही आएगा ।हैवर का ट्वीट करना और अपने बयान से पलट जाना इस ओर संकेत कर रहे हैं कि राज्य के विपक्षी पार्टियों की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आ गई हैं, लेकिन काश ऐसा पूर्ण सत्य होता, ट्वीट की भाषा तो कम से कम ऐसा ही बता रही है। स्पेशल ब्रांच के पदाधिकारियों का यह भी कहना है कि अब इस बिंदु पर भी जांच आगे बढ़ाई जाएगी कि हैबर के संबंध झारखंड के अलावा अन्य किसी बड़े संस्थान के पदाधिकारी के साथ था अथवा नहीं।

पहले भी स्पेशल ब्रांच के लोग संदेह के घेरे में रहे हैं लेकिन CS के मामले में इतना जल्दी एक्सपोज हो जाएंगे यह किसी को विश्वास नहीं था लेकिन सरकार जानती है CS का रिटायरमेंट फरवरी में है, इसलिए इस जांच रिपोर्ट को उनके रिटायरमेंट के पहले क्लोज कर के क्लीन चिट दे देना जरूरी है। अन्यथा यदि झारखंड में सरकार बदली तो उनके लिए मुसीबतें खड़ी हो सकती है। विशेषज्ञों का मत है कि इस प्रकार की घटना राज्य हित में नहीं मानी जा सकती है, चाहे जो भी हो इस गंभीर मुद्दे पर सरकार को जांच एजेंसियों को काफी मुस्तैदी के साथ कदम बढ़ाना चाहिए था लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा है लोकतंत्र में जब व्यक्ति संस्थाओं से ऊपर दिखने लगे तो इसे खतरनाक संकेत के रूप में देखा जा सकता है ।

दबी जुबान से नाम न बताने की शर्त पर कुछ पदाधिकारियों का तो यह भी कहना है कि CS के विरुद्ध गहराई से उनके क्रिया-कलाप का सही मूल्यांकन किया जाए तो अनेक मामले सामने आ सकते हैं लेकिन उनका यह भी कहना है कि वर्तमान सरकार में इस प्रकार की कोई संभावना नहीं दिखती है ।

जांच की लीपापोती ने एक तरह से राज्य के सभी विपक्षी पार्टी के नेताओं को अपमानित भी किया है .प्रत्यक्षता ऐसी परिपाटी राज्य हित में सही नहीं मानी जा सकती है।

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