ये गुस्सा कहीं खिसका न दे बीजेपी की सियासी जमीन

राजधानी रांची में इन दिनों प्रशासन सख्त है, सरकार के नियम कायदों को पूरी मुस्तैदी से पूरा करा रही है। अवैध कब्जों से लेकर रोड, ट्रैफिक को खुद मुखिया जी सड़क पर उतरकर ठीक करवा चुके हैं।

इन सबके बीच शहरवासी हलकान हैं, व्यापारियों में रोष है और आम नागरिक क्षुब्ध। उधर, सबसे ज्यादा चोट ठेलेवाले, खोमचेवाले, सब्जी-भाजी बेचने वालों पर पड़ी है। जब शहर के हजारों लोगों पर प्रशासन की लाठी पड़ी है, तो लाजिमी है कि राजनीति होगी। इसलिए विपक्ष अपना धर्म निभाते हुए सड़क पर है। सरकार के खिलाफ लोगों को गोलबंद किया जा रहा है। उनके गुस्से को सियासी जामा पहनाया जा रहा है। जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, सियासी पहलकदमी बढ़ती जा रही है, ऐसे में विपक्ष को बैठे-बिठाये एक मुद्दा मिल गया।

जब लोगों के घर उजड़ रहे हों, कारोबार उजड़ रहे हों, तो इससे बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्या हो सकता है। इसलिए सियायत जारी है। आम जनता की परेशानियों के बहाने सरकार पर खूब निशाना साधा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी पार्टी के विधायक, सांसद का सब्र टूटता जा रहा है। क्योंकि प्रशासन शहरवासियों की परेशानियां जितनी बढ़ाएगा उसका असर आगामी चुनावों पर पड़ेगा और पार्टी के भीतर व बाहर मौजूद विरोधी भरसक प्रयास करेंगे कि शहर में कोलाहल बना रहे ताकि उसकी झलक चुनावी नतीजों में दिखे। पब्लिक के गुस्से को कैसे सलटाया जाए उसकी कोशिश तो सत्ताधारी दल के नेता लगातार कर रहे हैं। पर जिनके घर, कारोबार, उजड़े हैं या उजड़ने वाले हैं उनकी तकलीफों को, जख्मों को सिर्फ आश्वासनों के मलहम से काम चल जाएगा, ऐसा तो नहीं लगता। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए ये नेता उजड़ते घरों की भी चिंता करेंगे या विरोधियों की जमीन मजबूत करेंगे।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *