राजनीति का नया दांव पत्थर गढ़ी

मनोज कुमार सिंह
झारखंड के कई जिलों में अचानक पत्थर गढ़ी होने लगी है, और इस पत्थर गढ़ी की आड़ में राजनीति का नया दांव भी शुरू हो गया है. ग्रामसभा की ताकत के सहारे खूंटी और सरायकेला जिला के कई गांव में पत्थर गढ़ी को महिमामंडित करते हुए संविधान की पांचवी अनुसूची की नई व्याख्या की जा रही है,भोले भाले गांव के आदिवासी संविधान की परिभाषा तो नहीं जानते हैं लेकिन उन के मानस पटल पर कुछ लोगों द्वारा नया संविधान लिखने का कुचक्र रचा जा रहा है. हो सकता है कि पत्थर गढ़ी करना आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत हो लेकिन इन्हीं घटनाओं को लेकर राजनीति का नया दांव खेलने का प्रयास किया जा रहा है.

राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास पत्थर गढ़ी की घटना पर अपना आक्रोश व्यक्त कर चुके हैं. उनके बयान के बाद राज्य के सभी विपक्षी पार्टियों के आदिवासी नेता उनको आदिवासी विरोधी बताने का बयान दे रहे हैं. मुख्यमंत्री ने जिस संदर्भ में भी यह बयान दिया है, उनकी मंशा आदिवासी समाज को देशद्रोही बताने की नहीं थी, लेकिन उनके ऊपर लगातार आदिवासी नेताओं द्वारा बयानबाजी और आरोप प्रत्यारोप किए जा रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी का कोई भी आदिवासी नेता मुख्यमंत्री के ऊपर हो रहे राजनीतिक बयान के बचाव में नहीं दिखाई दे रहा है. इससे यह तो संकेत जरूर मिल रहा है कि भाजपा के अंदर आदिवासी नेता मुख्यमंत्री के क्रियाकलाप से खुश नहीं हैं, या फिर पत्थर गढ़ी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कुछ बोलने से कतरा रहे हैं.झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पर सीधा हमला करते हुए यह बयान दिया है कि रघुवर दास आदिवासी विरोधी हैं. श्री सोरेन के बयान का समर्थन उनके पार्टी के अन्य विधायक दीपक बिरुवा, दशरथ गगराई, चंपई सोरेन ने भी किया है. ऐसा लगता है कि पत्थर गढ़ी की आड़ में नया राजनीतिक दांव खेला जा रहा है. राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदल रहे हैं .और आदिवासी समाज को गोलबंद करने के लिए कुछ लोग भावना भड़काने का काम कर रहे हैं ,जो राज्य हित में नहीं है .आदिवासी समाज के सांस्कृतिक विरासत पर शोध करने वाले कुछ जानकार लोगों का कहना है कि पत्थर गढ़ी का उद्देश्य आदिवासी समाज अच्छी तरह से समझता है लेकिन पांचवी अनुसूची और ग्राम सभा के अधिकार के मुद्दे पर पूरे समाज को भटकाया जा रहा है. ऐसा कहीं नहीं है कि पत्थर गढ़ी से सरकार उनको रोक रही है बल्कि सरकार का आक्रोश वैसे कथित राष्ट्रविरोधी तत्वों के विरुद्ध है, जो सही है.

कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अरुण उरांव भी नए राजनीतिक दांव पेच में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं और पत्थर गढ़ी के मामले को लेकर आक्रामक बयान जारी कर रहे हैं.विगत कुछ महीनों में ऐसा देखा गया है कि पत्थर गढ़ी करने के बहाने ग्रामीणों द्वारा समानांतर सरकार चलाने और सरकार के नुमाइंदों को बंधक बनाने का काम भी किया गया था. इस देश में समानांतर सरकार चलाने और कानून से ऊपर उठकर अपने को सर्वशक्तिमान समझने की इजाजत संविधान नहीं देता है.यह भी देखा गया कि कुछ जगहों पर पत्थर गढ़ी करके कुछ असामाजिक तत्वों ने गांव में अफीम की खेती का काम चालू किया था. सरकार ने सख्ती दिखाते हुए अफीम की खेती को नष्ट तो कर दिया, लेकिन उन माफियाओं तक नहीं पहुंच सकी जो भोले भाले आदिवासी नौजवानों को नशे की गिरफ्त की ओर ले जा रहे थे. अफीम की खेती करने में गांव वालों को सामान्य खेती से ज्यादा पैसे मिलते हैं. वैसी स्थिति में उन्हें ऐसा लग रहा था कि मेरी आमदनी बढ़ाने का एक बढ़िया जरिया है और वह इस बात को नहीं समझ पाए कि हम जो काम कर रहे हैं, वह देश के कानून के खिलाफ है. ऐसे में कुछ संगठित संस्थाएं एवं अफीम माफिया मिलकर नए सिरे से पत्थर गढ़ी की परिभाषा रच रहे हैं और आदिवासी राजनीति करने वाले लोगों को अपने गुड फेथ में लेकर सक्रिय हो गए हैं. ऐसे सफेदपोश नेताओं का चाल चरित्र जनता के बीच उजागर कौन करेगा! यह यक्ष प्रश्न है. लेकिन सच्चाई तो यह है की पत्थर गढ़ी की आड़ में नया राजनीतिक दांव पेच खेला जा रहा है.

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