स्थानीय और नियोजन नीति पर उलगुलान का नाटक

मनोज कुमार सिंह

विगत दिनों बदलते घटनाक्रम के बाद स्थानीय और नियोजन नीति के महासंग्राम में अब सभी राजनीतिक दल उलगुलान का नाटक कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे हैं। विदित हो कि 2003 से लेकर 2016 तक झारखंड में सभी पार्टियों की सरकारें रही लेकिन किसी भी दल ने सत्ता में रहते हुए स्थानीय एवं नियोजन नीति का प्रारूप तैयार नहीं किया, केवल विचार-विमर्श करते रहे।

पिछले वर्ष रघुवर सरकार ने राज्य के लिए एक स्थानीय नीति की घोषणा की इस नीति की अधिसूचना के पश्चात सत्ता पक्ष के सहयोगी दल आजसू, विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन, जेवीएम, कांग्रेस के अलावा छोटी नामधारी पार्टियां एवं सामाजिक संगठनों द्वारा इसका विरोध शुरू हो गया लेकिन मामला तब गरमाया जब बजट सत्र के दौरान सत्ता पक्ष के 26 विधायकों ने इस नीति के विरोध में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा। उधर, विधायकों की गोलबंदी होते देख रांची से दिल्ली तक टेलीफोन घनघनाने लगा, राज्य के दो वरिष्ठ नेता सरयू राय एवं अर्जुन मुंडा आपस में बैठकर इस संवैधानिक संकट का रास्ता तलाशने की कोशिश करने लगे लेकिन इस बैठक में भी सत्ता परिवर्तन की झलक दिख रही थी। दबी जुबान से विधायक कुछ कह तो नहीं रहे थे लेकिन आगामी चुनाव को देखते हुए उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ-साफ दिख रही थीं ।

राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी जब सत्ता में थे तो उस समय भाजपा की सरकार थी और उनके द्वारा जो डोमिसाइल नीति लाया गया था उस पर पूरे राज्य में बवाल हुआ। ऐसा लगा कि राज्य एक नए झंझावात में फंस गया है। तब से लेकर आज तक किसी भी पार्टी के पास झारखंड के स्थानीय समस्याओं के प्रति कोई स्पष्ट नजरिया नहीं है और यही कारण है कि सत्ता मिलते ही नेता चुपचाप कुंडली मारकर बैठ जाते हैं।

चुनाव आने के पहले राजनीति करने के लिए इस मुद्दे को गरमाया जाता है और फिर पुनः वही ढाक के तीन पात। दिक्कत स्थानीय और नियोजन नीति को बनाने में नहीं है, दिक्कत है सहजता से समाज के सभी वर्गों को विश्वास में लेने का है और यही काम किसी भी राजनीतिक दल द्वारा इमानदारी से नहीं किया गया। अब समाचार पत्रों के माध्यम से नए उलगुलान की घोषणा की जा रही है सामाजिक संगठनों को पर्दे के पीछे से सक्रिय किया जा रहा है, जिससे वह धरना प्रदर्शन आगजनी और अराजकता का माहौल पैदा करें और इस बनी बनाई आग पर अपनी अपनी रोटी सेंकी जाए।

स्थानीय नीति को लेकर इस प्रकार के बवंडर सिर्फ झारखंड में ही देखने को मिलते हैं किसी अन्य राज्य में नहीं। इसके पीछे के प्रमुख कारणों पर तर्कसंगत विचार किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि टुकड़ों-टुकड़ों में लोगों के अधिकारों एवं नौकरियों के हनन का भय दिखाकर उन्हें बरगलाया जाता है, और फिर झारखंड में रहने वालों के बीच आपसी भाईचारे को तार-तार किया जाता है तथा बड़ी कलात्मकता से बनाई गई इस भट्ठी पर सभी लोग अपनी- अपनी रोटी अपने-अपने हिसाब सेक सकते हैं । जब वह पक जाता है, उन्हीं रोटियों को लेकर विधानसभा में बैठकर मजा लेते हैं।

हालात अत्यंत नाजुक है और इसका समाधान उतना ही कठिन। ऐसे में दिल्ली दरबार के दूत झारखंड के विधायकों से से मिलकर क्या रास्ता निकालते हैं यह तो अभी अस्पष्ट नहीं है लेकिन इतना जरूर तय है कि चुनाव तक यह मामला शांत होने वाला नहीं है।

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