सैनिक की मौत पर राजनीति कर रहे भभुआ के पुलिस अधिकारी!

1999 में लड़े गए कारगिल युद्ध के हीरो थे सैनिक ओम प्रकाश तिवारी. ओम प्रकाश की बहादुरी पर पूरे कैमुर को गर्व था. लेकिन पाकिस्तानी सेना को धूल चटाने वाला ये वीर सपूत अपने ही घर में पुलिस अधिकारियों की राजनीति का शिकार हो गया. भगवानपुर थाने के ओरगांव के रहने वाले  ओम प्रकाश तिवारी छुट्टियों में गांव आए थे और अपना बक़ाया पैसा वसूलने के लिए उन्होंने कुछ बकायदारों को कहा. बकायदारों ने उन्हें पैसा लौटने की बात कह कर बुलाया और उनकी निर्मम हत्या कर दी. ओरगांव के ही रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि धोखे से सैनिक ओम प्रकाश तिवारी को बुलाकर कई लोगों ने चाकुओं से गोद कर उनकी निर्मम हत्या कर दी. उनकी दोनों आंखें निकाल ली गयी और उनके छत-विछत शरीर को नदी में फेंक दिया गया.

यहीं से एक मृत सैनिक के साथ पुलिस राजनीति की कहानी शुरू होती है. 30 सितंबर 2017 को सैनिक की निर्मम हत्या हुई. उनके डेडबॉडी पर कई ज़ख़्म पाये गए, उनकी आंखें निकली गयी लेकिन कैमुर एस.पी. का दूसरे ही दिन बयान आ गया कि सैनिक ओम प्रकाश तिवारी मिरगी की वजह से मरा. यहां ध्यान देने की बात है कि मिरगी का कोई रोगी सेना में भर्ती ही नहीं हो सकता. दूसरा ऐसा हास्यास्पद बयान देने से पहले कैमुर पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतज़ार भी नहीं किया. ऐसे में वरिष्ठ भाजपा नेता महेंद्र चौबे सवाल पूछते हैं कि पुलिस प्रशासन के अधिकारी हत्यारों को क्यों बचाना चाह रहे हैं? वह पूछते हैं कि एक सैनिक की निर्मम हत्या हो जाती है और पुलिस का एक अधिकारी भी पीड़ित के परिजनों से मिलने नहीं पहुंचता. आख़िर कौन सी हड़बड़ी है कि इस मामले को पहले दिन से भटका कर पीड़ित परिजनों के साथ नाइंसाफ़ी की जा रही है. महेंद्र चौबे कहते हैं कि पुलिस अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि यह लालू प्रसाद का जंगल राज नहीं है, ये एनडीए का शासन है. वह कहते हैं कि हमारे माननीय उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी जी का हमेशा स्वच्छ और पारदर्शी प्रशासन पर ज़ोर रहा है. इसलिए गड़बड़ी करने वाले पुलिस अधिकारी नहीं बचेंगे. शहीद के परिजनों को न्याय मिल कर रहेगा.

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *