शुरू हो गई अखाड़े की राजनीति

मनोज कुमार सिंह
झारखंड में रहने वाले आदिवासी और कुर्मी दोनों ने मिलकर अलग राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और हर आंदोलन एक साथ मिलकर कर लड़े लेकिन कुर्मी जाति द्वारा अनुसूचित जनजाति में शामिल होने की मांग को लेकर राजनीति का अखाड़ा बनने लगा है। जहां एक और कुर्मी संघर्ष मोर्चा के नेता शीतल ओहदार गांव-गांव घूमकर 29 अप्रैल को महारैली के लिए अभियान चला रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय सरना समाज उत्थान समिति ने यह फैसला लिया है कि अगले कुछ दिनों में जिन विधायकों और सांसदों ने कुर्मी जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का अनुशंसा किया है उनका पुतला दहन किया जाएगा। पूरे राज्य में कुर्मी और आदिवासी अगर इस मुद्दे को लेकर आमने-सामने होने लगेंगे और एक दूसरे का विरोध प्रदर्शन करेंगे तो राज्य में एक बड़ा वर्ग संघर्ष शुरू हो जाएगा। अभी तक आदिवासी वर्ग के किसी बड़े नेता द्वारा गोलबंदी तो नहीं दिख रही है लेकिन पर्दे के पीछे से कहीं ना कहीं उनकी मौन स्वीकृति से हालात और भी बिगड़ेंगे।

विगत 28 जनवरी को मोराबादी मैदान में लाखों की संख्या में कुर्मी जाति के लोग इकट्ठा होकर जिस प्रकार का तेवर दिखलाएं और फिर 29 अप्रैल को महारैली का उद्घोष कर रहे हैं, उससे एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि कुर्मी जाति अपनी मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। वहीं वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में सरकार द्वारा कोई स्टैंड लेना भी आसान नहीं है। यदि राज्य में कुर्मी और आदिवासी की गोलबंदी करने में कुछ लोग सफल हो जाएंगे तो भविष्य में राजनीतिक उथल-पुथल और वर्ग संघर्ष से राज्य को काफी नुकसान होगा। देखा जाए तो कुर्मी नेताओं में अंदर ही अंदर प्रखर होने और समाज के भावना के साथ खड़े होने की मजबूरी भी दिख रही है, क्योंकि आंदोलन का आकार बढ़ता जा रहा है और उसमें आक्रमकता आने की संभावना बढ़ गई है। महतो, मांझी और मुस्लिम की जुगलबंदी द्वारा लंबे समय से अपना जनाधार बढ़ाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा को दुविधा में ला दिया है, विगत दिनों जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन द्वारा दिया गया बयान यह संकेत दे रहा है कि आदिवासी और कुर्मी के बीच जो हालात बन रहे हैं वह भविष्य में आक्रामक भी हो सकता है। जब विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा नेताओं का पुतला दहन का कार्यक्रम बनाया जा रहा है तो इसे गंभीर मामला ही समझा जाएगा।

प्रबुद्ध लोगों का यह मानना है कि ऐसे नाजुक विषय पर मिल-बैठकर बातचीत होनी चाहिए तभी जाकर कोई सहूलियत का रास्ता निकल सकता है लेकिन उनको यह संदेह है कि राजनीतिक लोग ऐसा करने नहीं देंगे। राजनीति गुरु द्वारा इस प्रकार के गोलबंदी और उसके परिणाम के संबंध में पहले भी आशंका जताई गई थी जो अब सतह पर दिखने लगा है, दोनों वर्ग के लोग यदि अपनी समस्या लेकर सड़क पर उतर जाएंगे तो हालात और भी खराब हो जाएगा। पिछड़े राज्य के लिए इस प्रकार के जातीय संघर्ष विकास को और पीछे ले जाएंगे और इससे बचना भी चाहिए।

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