झारखंड में अखाड़े की राजनीति भाग – 3

मनोज कुमार सिंह
राजनीतिक गुरु डॉट कॉम द्वारा लगातार अखाड़े की राजनीति की पड़ताल की जा रही है और भविष्य में होने वाले उन राजनीतिक पहलुओं का विश्लेषण भी किया जा रहा है। दो अखाड़े का ध्रुवीकरण तो साफ-साफ नजर आने लगा है- एक कुर्मी को आदिवासी का दर्जा देने की मांग करने वाले और दूसरी ओर आदिवासी संगठनों द्वारा इसका विरोध। लेकिन पर्दे के पीछे झारखंड की राजनीति में बहुत जल्दी एक और नए अखाड़े का जन्म होगा और वह अखाड़ा है ओबीसी का। अब देखना यह है कि इन तीन अखाड़ों के रिंग में वर्तमान राजनीतिक दल किस प्रकार की रणनीति तैयार कर उतरते हैं।

यह तो सही है कि जो मुद्दे गरमा रहे हैं, उनका मकसद मात्र ध्रुवीकरण नहीं है, बल्कि इसके पीछे राज्य की कुछ नीतियां और उनके साथ लंबे समय से न्याय न हो पाना कारण हो सकता है। जैसे, राज्य के लगभग 53 परसेंट आबादी ओबीसी की है लेकिन उनको मंडल कमीशन का फायदा यानि 27% आरक्षण नहीं मिल पाया, यह एक गंभीर विषय है और विगत 17 वर्षों में इस पर बैठकर चिंतन-मनन उस प्रकार से नहीं किया गया, या यूं कहें कि इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। राज्य सरकारों द्वारा इसका समाधान निकालना चाहिए था एक तो राज्य की पिछड़ी जातियां 27 % आरक्षण के बदले मात्र 14% आरक्षण प्राप्त करके भी खामोश हैं, वहीं जिला रोस्टर को उठाकर देखा जाए तो 7 जिले ऐसे हैं जहां ओबीसी का आरक्षण जीरो परसेंट है। गंभीरता से देखें तो इतनी बड़ी आबादी के हितों को नजरअंदाज करना ही अपने आप में एक बड़े आंदोलन के खड़े होने का मार्ग प्रशस्त करना है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने अभी तक अपने पार्टी के एजेंडा में इसे शामिल नहीं किया है। यह आश्चर्य का विषय है और इसकी पड़ताल की जाए तो ओबीसी का अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा साबित होगा।

मजबूरन, सभी राजनीतिक पार्टियों को इसके रिंग में आकर उन्हें उनका संवैधानिक अधिकार देना ही पड़ेगा। अब धीरे-धीरे यह मामला सुलगने भी लगा। लोग ठगा महसूस कर रहे हैं। दूसरी ओर आरक्षण एक ऐसा विषय है जिसमें छेड़छाड़ करना अपने आप में खतरनाक माना जाता रहा है और आरक्षण के परसेंटेज को लेकर इधर-उधर की बात नहीं की जा सकती। इसलिए जिला रोस्टर और राज्य रोस्टर में ओबीसी को उचित प्रतिनिधित्व देने का एकमात्र रास्ता है और वह है तमिलनाडु फार्मूले के अनुसार राज्य में 50% आरक्षण की सीमा से बाहर निकला जाए। राज्य सरकार द्वारा पिछड़ी जातियों को उचित प्रतिनिधित्व देते हुए तत्काल प्रभाव से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए, अन्यथा आंदोलनों का एक दौर चल पड़ेगा और दूसरे सबसे बड़े अखाड़े यानि आदिवासी समाज को इन्हीं मुद्दों पर बरगलाने का या उन्हें भयभीत करने का कुचक्र भी रचा जाएगा। आमतौर पर झारखंड के संबंध में अनुभव तो यही बताते हैं, क्योंकि जिन कानूनों में संशोधन करने का प्रयास सरकारों ने किया उसके विरुद्ध राज्य की सड़कों पर इनका आंदोलन मजबूत होता दिखने लगा। यहां तक की झारखंड के आदिवासी नेता भी इन कानूनों के सुधार के पक्ष में नहीं खड़े नजर आते हैं, अर्थात अखाड़े की राजनीति से ऊपर उठना शायद थोड़ा मुश्किल हो। लेकिन वक्त की मांग है कि राज्य हित में राज्य की सभी जातियों के वाजिब हक की बात ईमानदारी से की जाए न कि मूल विषय से हटकर केवल राजनीति हो। भारतीय जनता पार्टी और आजसू का गठबंधन अब टूटने के कगार पर है और दोनों पार्टियों के नेताओं की भाव भंगिमा यह बता रही है कि दोनों दल अगले चुनाव में शायद एक साथ ना खड़े हों ।भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति संक्रमण काल से गुजर रही है, पार्टी, सरकार के अंदर हो रहे इस अंतर-कलह पर नजर बनाए हुए है, लेकिन जिन मुद्दों को लेकर बातें सतह से ऊपर जा चुकी हैं उसकी भरपाई शायद ही हो पाए। इसका सीधा नुकसान लोकसभा और विधानसभा चुनाव में दिखेगा और ऐसे नाजुक समय में गठबंधन के साथी का सुर बदल जाना परेशानी का दूसरा सबब भी हो सकता है ।अब यह देखना है कि विपक्षी पार्टियों की एकता का राग क्या होता है, क्योंकि महागठबंधन का राग तो सभी अलापते हैं लेकिन अंदर ही अंदर स्थानीय कार्यकर्ता अपने को ऊर्जावान नहीं मानते हैं, उन्हें यह डर सताता रहता है कि बामुश्किल अपने ऊर्जा का प्रयोग करके यदि संगठन को ऊंचाई पर ले भी गए तो क्या फायदा, जब एक रात में गठबंधन नीति के तहत सीटों का वारा न्यारा कर दिया जाता रहा है।

इसी भय से महागठबंधन के अंदर की सभी पार्टियों के कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में न सो पा रहे हैं, और ना दौड़ पा रहे हैं। यह तो भविष्य की बात है लेकिन अखाड़े की राजनीति का हिस्सा कोई दल न बने ऐसा हो नहीं सकता। राजनीतिक गुरु डॉट कॉम द्वारा इशारा किया भी गया था कि झारखंड में प्रमंडल के हालात, सामाजिक ताना-बाना एवं स्थानीय राजनीति का मिजाज बिल्कुल अलग-अलग है और राज्य में कोई भी ऐसा सूरमा नहीं है जिसका जनाधार पूरे राज्य में दिखता हो। यही कारण है कि लोग स्थानीय तौर पर अखाड़े की राजनीति का हिस्सा बन जाएंगे और अपनी सीट बचाने के लिए स्थापित मापदंडों के विरुद्ध स्वयंभू नेता बनने के चक्कर में जनता को दिग्भ्रमित करते रहेंगे। विगत कुछ दिनों में मसाला बनकर तैयार भी है- और वह मसाला है -ओबीसी आरक्षण नीति में विसंगति, स्थानीय एवं नियोजन नीति की विसंगतियां, कुर्मी को एसटी का दर्जा देने की प्रबल मांग के आंदोलन और विगत दिनों सीएनटी-एसपीटी, भूमि अधिग्रहण बिल, धर्म परिवर्तन बिल, सरकार के कुछ फैसले। वर्तमान राजनीतिक दलों का किसी भी विषय पर स्पष्ट नजरिया ना होना अखाड़े की राजनीति को पैदा करने का दूसरा कारण है। और यहीं से शुरू होती है झारखंड की राजनीति में होने वाली उस झंकार की धुन जिसे राजनीति गुरु डॉट कॉम द्वारा अखाड़े की राजनीति कहा जा रहा है। हम लगातार उस अखाड़े के स्वरूप और उससे होने वाले घटनाक्रम के अंदेशा को जनता के सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। क्रमशः....

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