झारखंड में अखाड़े की राजनीति भाग – 2

मनोज कुमार सिंह
राजनीति गुरु डॉट कॉम के कल के अंक में जो अंदेशा जताया गया था, उसकी बानगी अब दिखने लगी है, विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में टुंडी के विधायक राजकिशोर महतो ने कहा है कि कुर्मी को एसटी की सूची में शामिल करने के दो ही रास्ते हैं। पहला प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपकर टीआरआई से पुनः रिसर्च कराने का अनुरोध और दूसरा सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल करना। मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने और राज्य सरकार की अनुशंसा से अब कुछ होने वाला नहीं है। वर्ष 2004 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा था, जिसे 31 जुलाई 2015 को केंद्र ने खारिज कर दिया था, दूसरी ओर टीआरआई ने 2004 में राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, इसमें कहा गया था कि झारखंड में कुर्मी जाति को यथास्थिति में बनाए रखने की जरुरत है। अपने रिपोर्ट में टीआरआई ने यह भी कहा था कि झारखंड में रहने वाले कुर्मी और महतो जाति की उत्पत्ति आर्य और द्रविड़ समूह के सम्मिश्रण से हुई है। छोटा नागपुर की कुर्मी जाति को 1931 में ऐबोरिजिनल ट्राइब की सूची में रखा गया था, परंतु 1950 में जारी अधिसूचना में एसटी सूची में कुर्मी महतो का नाम नहीं है।

यह तो हुई कानून की बात और संवैधानिक रूप से कुर्मी को एसटी का दर्जा देने की सबसे बड़ी बाधा। लेकिन समाज के द्वारा बड़े आंदोलन और दबाव बनाने का जो खेल चल रहा है उसका क्या? दूसरी ओर सोमवार को रांची के मोराबादी में संगम गार्डन में आयोजित विभिन्न आदिवासी संगठनों की बैठक के दौरान आदिवासी नेताओं ने कड़े शब्दों में इस बात का विरोध किया कि जिन 42 विधायक और सांसदों ने कुर्मी को एसटी में शामिल करने की अनुशंसाएं की हैं, वह सब आदिवासी विरोधी हैं। इन विधायकों में बीजेपी, जेएमएम, आजसू, जेवीएम एवं कांग्रेस पार्टी के विधायक शामिल हैं। इन सबके बावजूद सामाजिक संगठनों ने एक स्वर में कहा है कि कुर्मी को आदिवासी का दर्जा देने की बात को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसके लिए क्रमबद्ध तरीके से पूरे राज्य में आदिवासी संगठन धरना-प्रदर्शन करेंगे और उन विधायकों, सांसदों का विरोध भी करेंगे जो इनके समर्थन में आगे आए हैं। अब इस मामले को एक दूसरे नजरिए से परखा जाए तो अखाड़े की राजनीति की वह तस्वीर सामने दिखने लगी है, जिसका अंदेशा राजनीति गुरु लगातार उठा रहा है। एक तरफ कुर्मी की गोलबंदी और दूसरी तरफ आदिवासी वर्ग की गोलबंदी वर्तमान राजनीति के दिशा और दशा को बदल कर रख देगी। झारखंड के इतिहास के पन्नों में उसके आंदोलनों और राज्य बनने की घटना की बारीकी से पड़ताल की जाए तो जितने बड़े आंदोलन हुए हैं, चाहे वह साहूकारों के विरुद्ध हो, अंग्रेजों के विरुद्ध हो, या फिर अलग झारखंड राज्य की मांग हो। सभी लड़ाईयां राज्य के दो मूलवासी वर्ग के अग्रणी नेताओं ने मिलकर लड़ी हैं। इन आंदोलनों ने राज्य में नया समीकरण भी पैदा किया है। यहां तक की झारखंड मुक्ति मोर्चा, आजसू जैसे क्षेत्रीय दलों कि नींव भी इन्हीं आंदोलनों की उपज रही है।

लेकिन आज सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि यदि इन दोनों मूलवासी वर्गों की गोलबंदी का आकार बढ़ जाता है तो फिर राज्य के राजनीतिक हालात क्या होंगे? उत्तरी और दक्षिणी छोटानागपुर, कोल्हान, कोयलांचल क्षेत्रों को मिला दिया जाए तो लगभग 22 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मत निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में है, और लोकसभा की 3 सीटें इनके वोट से ही प्रभावित होते रहे हैं। यही वह क्षेत्र हैं जहां महतो, मांझी और मुस्लिम समीकरण के सहारे झारखंड मुक्ति मोर्चा के अधिकांश नेता जीतते रहे हैं। दूसरी ओर विगत चुनाव में आजसू और भाजपा के गठजोड़ से कुर्मी वोटों का ध्रुवीकरण इन दो दलों के पक्ष में भी दिखाई दे रहा था जिसके कारण भाजपा ने तीनों लोक सभा सीटों और कई विधानसभा सीटों पर विजय प्राप्त किया था। यदि ध्रुवीकरण का एंगल बदल जाए तो वर्तमान में यह देखना ज्यादा आवश्यक है कि भविष्य की तस्वीर क्या होगी। लेकिन इसके पहले की भविष्य की तस्वीर पर चर्चा हो सामाजिक चिंतक इस गोलबंदी के उस परिणाम की ओर ज्यादा चिंतित हैं, जो वर्ग संघर्ष की ओर बढ़ रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि इस वर्ग संघर्ष और समाज की शुचिता को यदि नहीं बचाया गया तो राज्य के विकास की गति रुक जाएगी और लोग इन राजनीतिक दलों के पंजों में फंसकर रह जाएंगे। अगले कुछ महीनों में इसकी तस्वीर बदलेगी क्योंकि जो सवाल समाज के भीतर हो रहे थे, लोगों ने उसे सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया। इतिहासकारों का यह मानना है कि सड़कों पर होने वाले ज्यादातर आंदोलन हिंसक और नेतृत्वविहीन आकार लेने लगते हैं और एक उन्मादी भीड़ का स्वरूप बनकर रह जाता है। जिससे किसी का भला नहीं होता। उनका कहना है कि राजस्थान के गुर्जर आंदोलन और हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट आंदोलन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। किसी भी समाज को अपनी बुनियादी मुद्दों को उठाने का हक़ तो है लेकिन समाज की आड़ में पर्दे के पीछे जो कुचक्र रचे जाते हैं उसका क्या? अखाड़े की राजनीति तो चल पड़ी है अब आगे यह देखना है कि इस अखाड़े में कौन पहलवान कितने दमखम के साथ उतर कर अपना प्रदर्शन जारी रखता है क्रमश:.......

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