बंधु तिर्की का सियासी दांव, पार्टी ने पल्ला झाड़ा

पत्थलगड़ी को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकार और विपक्ष आमने सामने है। पर इस मामले पर नया मोड़ तब आया जब झाविमो नेता बंधु तिर्की ने दखल दिया। उन्होंने कहा है कि सरकार को आदिवासी संस्कृति और परंपरा की जानकारी नहीं है। पत्थलगड़ी के माध्यम से संविधान की जानकारी ग्रामीण जनता को दी जाती है, इसी क्रम में उन्होंने कहा है कि इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 17 फरवरी 2018 को बन होरा गांव में काली गाय की बलि दी जाएगी। हालांकि पार्टी अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि बंधु तिर्की ने जो कुछ कहा है, वह परंपरा की बात कर रहे थे। वह पार्टी की ओर से नहीं बोल रहे थे बल्कि पत्थलगड़ी को लेकर सरकार का रवैये का विरोध कर रहे थे।

बंधु तिर्की के बयान पर फंसती झाविमो ने उनके बयान से किनारा करते हुए प्रेस विज्ञप्ति जारी की। कहा है कि बंधु तिर्की ने किस संदर्भ में गाय की बलि देने की बात कही है, ये वही जानते हैं इस पर वही जवाब दे सकते हैं। पत्थलगड़ी पर दिए गए बयान उनके निजी विचार हैं। पार्टी ऐसे किसी बयान का समर्थन नहीं करती है। झाविमो सभी धर्मों का सम्मान करती है।

बंधु तिर्की के बयान के बाद राज्य में भाजपा सहित कई संगठनों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आयी है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो बंधु तिर्की का दिया बयान सोचा- समझा और राजनीतिक बयान है। पत्थलगड़ी की पंरपरा से भाजपा के सुनियोजित सामाजिक इंजीनियरिंग पर वह चोट करने की जुगत में हैं। जिस प्रकार भाजपा और उससे जुड़े संगठन एक खास मुद्दे को लेकर अपनी वोटबैंक को मजबूत करने में लगी है। इसकी भनक कई गैर भाजपाई आदिवासी संगठनों को भी है। इसकी एक झलक हाल ही में सालखन मुर्मू के नेतृत्व में आयोजित रैली में दिखी जिसमें राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ विभिन्न आदिवासी मूलवासी संगठनों ने आदिवासी सेंगल अभियान की बिगुल फूंकी।

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