सवर्णों को रिझाने में जुटे सियासी दल

मिशन 2019 को ध्यान में रखते हुए सभी दलों ने अपने-अपने सियासी समीकरण सेट करने शुरू कर दिए हैं। बिहार में दलितों और पिछड़ों के बाद अब सवर्णों को भी अपने पाले में करने की कवायद शुरू हो गई है। इसी कड़ी में सूबे की स्थिति को भांपते हुए कांग्रेस ने ब्राह्मण को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर इसकी शुरुआत कर दी है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ एससी, एसटी एक्ट में संशोधन बिल संसद में लाने पर देश भर का सवर्ण बीजेपी से नाराज हैं, उधर मोदी सरकार ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर पिछड़ों को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। लेकिन मोदी सरकार के इस कदम से सवर्ण उससे दूर जा रहे हैं ऐसी आशंका जतायी जा रही है। कांग्रेस इसी नाराजगी को हथियार बनाकर सवर्णों को अपने पक्ष में करना चाह रही है। हालांकि दूसरी विपक्षी पार्टियों की भी नजर इस वोट बैंक पर सेंधमारी की है और कई दल अपने-अपने तरीके से खुद को उनका हितैषी बता रहे हैं।

कांग्रेस ने मदन मोहन झा को बिहार की कमान सौंप दी है, तो वहीं भूमिहार समाज से आने वाले अखिलेश सिंह को चुनाव प्रचार समिति की जिम्मेदारी दी है। चार नए कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष में से दो भी अगड़ी जाति से आते हैं। कांग्रेस ने इसके जरिए एक संदेश देने की कोशिश की है और सवर्णों में अपना खोया जनाधार वापस पाने की जुगत में लग गई है।

वहीं, लालू यादव के वक्त अगड़ी जातियों की धूर विरोधी कही जाने वाली राजद भी अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रही है। हालांकि राजद ने कहा है कि दलितों और पिछड़ों का उत्थान हमारा पहला लक्ष्य है। तो वहीं कांग्रेस ने अपना सवर्ण कार्ड खेल दिया है। कांग्रेस का कहना है कि समाज में सभी वर्गों का ध्यान रखना जरूरी है।
इन सब के बीच सवर्णों द्वारा बिहार में हाल ही में किए गए एसटी, एससी के विरोध में बंद के बाद बीजेपी पूरी तरह बैकफुट पर आ गई है। वो ये भी जानती है कि दलित वोट बैंक साधने की कोशिश में अगड़ी जातियों के वोट बैंक पर उसकी पकड़ ढ़ीली हो गई है।

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