सियासी जमीन मजबूत करने में लगे हैं कामेश्वर बैठा

झारखंड के कई सियासी सूरमा कभी राजनीति के सूर्य थे, चमकते थे, उनके आस-पास प्रशंसकों की भीड़ थी। पर आज कोई नहीं जानता कि वह कहां हैं! किस हाल में हैं! यही राजनीति है। ऐसे में राजनीति गुरु ने ऐसे गुमनाम सियासी सूरमाओं की वर्तमान स्थिति को खंगालने की कोशिश की है। आप भी ऐसे लोगों के बारे में जानिये...और यह भी जानिये कि ऐसा क्यों हुआ!

झारखंड की राजनीति में कई ऐसे सियासी चेहरे रहे हैं जिन्होंने बहुत ही संघर्ष से सियासत में जगह बनाई है। इनमें पलामू के पूर्व सांसद कामेश्वर बैठा भी एक हैं। इनकी पृष्ठभूमि काफी संघर्षपूर्ण रही है। मैट्रिक पास कामेश्वर बैठा पलामू के विश्रामपुर के निवासी हैं, राजनीति में आने से पूर्व नक्सली संगठन पार्टी यूनिटी के सदस्य रहे। उन्होंने 1980 के दशक में ये संगठन ज्वाइन किया। कहा जाता है कि इसी दौरान उन पर 53 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हुए जो विभिन्न न्यायालयों में चल रहे हैं।

कामेश्वर बैठा ने अपने सियासी सफर की शुरुआत 2007 में की। पलामू के तत्कालीन सांसद मनोज भुइयां की सदस्यता समाप्त किये जाने के बाद 2007 में हुए उपचुनाव में श्री बैठा बसपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन राजद के घुरन राम ने उन्हें करीब 22 हजार मतों से पराजित कर दिया था। इसके बाद 2009 में लोकसभा के आम चुनाव में बैठा ने झामुमो के टिकट पर जेल से ही चुनाव लड़ा और घुरन राम को करीब 23 हजार मतों से हरा दिया। कोर्ट के आदेश पर ही उन्हें शपथ ग्रहण के लिए दिल्ली ले जाया गया था। हालांकि इसके बाद भी करीब दो साल 7 महीने के बाद 2011 के अंत में जेल से रिहा हुए।

2014 में बीजेपी की सदस्यता ली और चुनाव की तैयारियों में जुटे लेकिन पार्टी ने टिकट नहीं दिया, तो तृणमूल कांग्रेस की टिकट पर अपना किस्मत आजमाया पर बीजेपी के उम्मीदवार बीडी राम से चुनाव हार गए। इसके बाद उन्होंने 2017 में कांग्रेस का दामन थाम लिया और अभी पार्टी के एससी मोर्चा के अध्यक्ष हैं। बहरहाल, पलामू की सियासत में कामेश्वर बैठा नई रणनीति के तहत अपना किस्मत आजमाने की जुगत भिड़ा रहे हैं।

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