सूबे की सियासत में हमेशा याद किए जाएंगे नामधारी

झारखंड के कई सियासी सूरमा कभी राजनीति के सूर्य थे, चमकते थे, उनके आस-पास प्रशंसकों की भीड़ थी। पर आज कोई नहीं जानता कि वह कहां हैं! किस हाल में हैं! यही राजनीति है। ऐसे में राजनीति गुरु ने ऐसे गुमनाम सियासी सूरमाओं की वर्तमान स्थिति को खंगालने की कोशिश की है। आप भी ऐसे लोगों के बारे में जानिये...और यह भी जानिये कि ऐसा क्यों हुआ!

झारखंड की राजनीति का एक ऐसा नेता जिसकी पार्टी के इतर अपनी एक अलग इमेज हुआ करती थी। संयुक्त बिहार में एक कद्दावर नेता के रूप में सबों के जाने-पहचाने चेहरे थे, इंदर सिंह नामधारी। वे 90 के दशक में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। अलग झारखंड बनने के बाद वह पहले विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। अपने जुमलों को लेकर वह हमेशा सुर्खियों में बने रहते थे। विधानसभा में अपने जुमलों से माहौल को हमेशा खुशनुमा बनाए रखने को लेकर आज भी लोग उन्हें याद रखते हैं। पिछले कई वर्षों से उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया है, और सियासी चकाचौंध से दूर रहकर अधिकांश समय अपने गृह क्षेत्र पलामू में बीता रहे हैं। हालांकि वे अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश भी जरूर कर रहे हैं जिसके लिए हाल ही में पलामू में झाविमो के एक मिलन कार्यक्रम में भी वे शामिल हुए और दिलीप सिंह नामधारी ने जेवीएम का दामन थामा। इस मौके पर उन्होंने कहा भी कि भ्रष्टाचार मुक्त एवं विकासयुक्त झारखंड के निर्माण के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

पाकिस्तान के नौशेरा गांव में 1942 में जन्मे नामधारी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बिहार में की थी। पहली बार 1980 में डाल्टनगंज विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे। इसके बाद से लगातार राजनीति में अपना विशिष्ट पहचान बनाए रखा। इसी विधानसभा क्षेत्र से 1990, 1995, 2000, 2005 और 2007 (उपचुनाव) में विधायक चुने गए। 2000 में झारखंड अलग राज्य बनने के बाद निर्दलीय विधायक होते हुए भी सर्वसम्मति से विधानसभा के पहले अध्यक्ष बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में चतरा लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़े और भारी मतों से जीत हासिल की।

नामधारी ने बिहार में परिवहन और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री के रूप में बेहतर काम किया। उनके मंत्रित्वकाल में किए गए कई कार्यों को आज भी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बीआइटी, सिन्दरी से इलेक्ट्रोनिक्स में इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण करने वाले नामधारी आपातकाल के दौरान जेल भी गए।रामधारी सिंह दिनकर, हरिऔध और गुरूगोविंद सिंह की साहित्य में इनकी खास रूचि है। राजनीति के क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद, सरदार पटेल और लोकमान्य तिलक को आदर्श मानते हैं।

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