एकजुट विपक्ष बिगाड़ सकता है भाजपा का 60 प्लस का सपना

पटना में आयोजित भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली को नीतीश के खिलाफ मानकर या प्रदेश तक ही सीमित कर देखने की गलती भाजपा को मंहगी पड़ सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे का असर 2019 में कितना होगा ये अभी दूर की कौड़ी है। लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि लालू के मंच पर बैठे राजनेता चैन से नहीं बैठेंगे। इस लिहाज से महागठबंधन की कवायद मारक जरूर होगी।

चुनावों में अभी करीब दो वर्ष बाकी हैं पर देखा जाये तो संगठन को दुरूस्त करने के लिहाज से बहुत ज्यादा भी नहीं है। वैसे भी जब सत्ताधारी दल ही मिशन 2019 को लेकर अभी से दिन-रात स्ट्रैटजी पर काम कर रहा हो। झारखण्ड के संदर्भ में देखा जाय तो कांग्रेस, झाविमो और झामुमो अगर महागठबंधन की छतरी के नीचे आते हैं तो मुमकिन है कि ऐसे ही सोच-समझ वाले अन्य दल भी उस छतरी के नीचे आने की सोचें। सामाजिक और जातीय समीकरण के हिसाब से इनकी एकजुटता अगर कायम रही तो सत्तारूढ़ एनडीए को चित्त कर सकते हैं। देखा जाय तो वर्तमान रघुवर सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड को भुनाने के सिवा कोई ऐसा जमीनी काम जनता के सामने नहीं रखा है कि वो उसे हाथों हाथ लेगी। जो लोग झारखण्ड की राजनीति को नजदीक से देखते- बूझते रहे हैं। वे जानते हैं कि इन सब पर अकेले सीएनटी का मुद्दा भारी पड़ेगा।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो झारखण्ड में भाजपा को घेरना आसान है क्योंकि उसने सरकार यह कहकर चलायी कि उसे बहुमत हासिल है, भले ही इसके लिए झाविमो के विधायकों की खरीद- फरोख्त कर इसकी गुंजाईश बनायी हो। वहीं मुख्यमंत्री रघुवर दास विपक्ष को अक्सर ये कहते सुने जाते हैं कि जनता ने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार दी है। वह कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। विपक्ष इसी मुद्दे को लेकर जनता के बीच जायेगी कि बहुमत की सरकार ने क्या किया। उन वादों का क्या हुआ जो उसने बहुमत के बदले किये गये थे। जुमलेबाजी से एक बार वोट ली जा सकती है बार-बार नहीं। भाजपा को इसका जवाब देना इसलिए मुश्किल होगा क्योंकि स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा और सड़क तक, उसने ऐसी कोई व्यवस्था जनता को नहीं दी है जिसके बल पर वो दुबारा वोट मांग सके। वहीं रही सही कसर पार्टी कार्यकर्ता पूरी करेंगे। जो पहले से ही क्षुब्ध बैठे हैं। कई मौकों पर खुलेआम अपनी बात रख चुके हैं। जानकारों की मानें तो ये बात पार्टी के कई बड़े और अनुभवी नेता भी भलिभांति जानते हैं। विपक्ष ने सीएनटी पर सरकार को इस प्रकार घेरा कि अंततः उसे अपना फैसला बदलना पड़ा। इसके साथ ही विपक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि सरकार आदिवासी विरोधी है। खुद भाजपा के आदिवासी विधायक ये नहीं समझ पा रहे कि इतना बड़ा फैसला बिना रणनीतिक सोच के कैसे लिया गया।

विपक्षी एकजुटता गाय और धर्मांतरण के मुद्दे को वोट में बदलने में अगर कामयाब रही तो एनडीए का किला धराशायी होते देर नहीं लगेगा। गाय पर मचे बवाल ने राज्य के अल्पसंख्यक मुसलमानों को नये राजनीतिक विकल्प पर सोचने पर मजबूर कर दिया है। पर महागठबंधन की कवायद सफल रही तो ये मुश्किल आसान हो जाएगी। वहीं धर्मांतरण को लेकर बरपे हंगामें और इसाईयों पर धर्मांतरण के लगे आरोप, राज्य के कई सीटों पर विपक्ष के आकड़े को बढ़ा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि विपक्ष इन मुद्दों को अगले विधान सभा चुनाव में बेहद संजीदगी से उठायेगा। भाजपा के सांप्रदायिक कार्ड का जवाब वह धर्मनिरपेक्षता और विकास के मुद्दे से देगा। भाजपा के सियासी पैंतरे का आकलन विपक्ष बारीकी से कर रहा है। बहरहाल ये सारे समीकरण तब असरदार होंगे जब विपक्ष एक होगा। उनका नेतृत्व एक होगा।

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