विपक्षी एकता सिर्फ जुमला न रह जाए!

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार को बने तीन साल हो गए हैं। इस दौरान विपक्ष को जोड़ने के प्रयास एक बार नहीं कई बार हुए। पर इन तीन सालों में विपक्षी दल एकता की कोई ऐसी धुरी नहीं खोज पाये जिससे भाजपा को टक्कर दी जा सके। राष्ट्रपति-चुनाव विपक्षी एकता के लिए बढ़िया मौका था। सोनिया गांधी की पहल पर 17 दलों के नेता एक साथ बैठे, लेकिन संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी तय करने में इतनी अगर- मगर हुई कि मौका ही हाथ से निकल गया। विपक्ष बार-बार इकट्ठा हो रहा है पर जुड़ नहीं रहा। इसका कारण क्या है? क्या उनके पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसपर लोगों को भरोसा हो।

अपने-अपने राज्य में राजनीति के धुरंधरों को एक ऐसा नेता चाहिए जो उनके मतभेदों को भुला कर एक करे। उनके पास आज लोहिया और जेपी जैसा कोई नेता नहीं है। आज क्षेत्रीय दलों के विभिन्न नेता अपनी-अपनी राजनीतिक विरासत बचाने के जतन से ही नहीं निकल पा रहे हैं।

कांग्रेस राहुल गांधी को विकल्प के रूप में पेश कर रही है लेकिन नोटबंदी के विरोध में बुलाई गई बैठक में विपक्षी पार्टियों का ना पहुंचना इस बात का संकेत दे गया कि उन्हें राहुल का नेतृत्व मंजूर नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि कौन विपक्ष के गठबंधन का चेहरा होगा?

बात चाहे महागठबंधन की हो या फिर तीसरे मोर्चे की, क्षेत्रीय नेताओं को इकट्ठा करना सबसे बड़ा चुनौती का काम है। अपने राज्य में कांटे की लड़ाई करने वाले नेताओं को एक मंच पर बैठाना मुश्किल होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में लड़ाई ने वहां पर विपक्ष एकता को और कमजोर कर दिया। आज मुलायम अपनी पार्टी के हाशिये पर हैं और वो मोदी के प्रति नरम भी दिख रहे हैं। लालू प्रकरण के बाद मायावती को भी सीबीआई का डर सताने लगा हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं।

वहीं कांग्रेस की स्थिति भी लगातार खराब होती जा रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बीमारी ने उनके लिए नई सीमाएं खड़ी कर दी हैं। राहुल की राजनीतिक परिपक्वता पर उनके अपनी ही पार्टी के लोग कभी खुल कर तो कभी चुपचाप सवाल उठाते रहते हैं। राहुल गांधी के बारे में यह बात सभी को मालूम है कि वो न तो लोकसभा चुनाव में अपना राजनीतिक अस्तित्व बचा पाए और न ही राज्यों के विधानसभा चुनावों में ही अपना राजनीतिक कौशल दिखा पाए।

इतना ही नहीं अधिकांश राज्यों में कांग्रेस को केवल क्षेत्रीय दलों का ही सहारा रह गया है। कई राज्यों में कांग्रेस की हालत क्षेत्रीय दलों से भी ज्यादा खराब है, ऐसे में कांग्रेस के विधायक पार्टी से दूर जा रहे हैं तो इसमें दूसरे दल कर भी क्या सकते हैं? और कांग्रेस गांधी परिवार से परे सोचना नहीं चाहती।

आज सबसे बड़ी समस्या है कि विपक्षी पार्टियों के पास नीति और साहस दोनों की कमी दिखती है। बीजेपी और संघ के व्यवस्थित और मजबूत संगठन के आगे उनके सारे फॉर्मूले और तरीके नाकाम हो रहे हैं। ऐसे में विपक्षी एकता ही खतरे में है।

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