कैसी साफ़-सुथरी सरकार…बड़े अधिकारी दागदार…

झारखण्ड की रघुवर सरकार के अच्छे दिन पता नहीं कहां उड़न छू हो गए! बेदाग होने का दावा करने वाली राज्य सरकार के दो सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी के दामन पर घोटाले का कलंक लग चुका है. फ़रवरी में रिटायर होनेवाली मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को तो थक हारकर कर सरकार ने नोटिस थमा दिया है. उन्हें 15 दिनों के अंदर जवाब देने को कहा गया है. राजबाला वर्मा पर आरोप है कि चाईबासा डी सी रहने के दौरान उन्होंने चारा घोटाले की अवैध निकासी पर रोक लगाने की कोई कोशिश नहीं की और 2003 से सीबीआई की किसी नोटिस का जवाब भी नहीं दिया. सरकार में बैठे हर शख्स को यह पता था. लेकिन सब कुछ जानते हुए भी एक आरोपी को आखिर मुख्यसचिव कैसे बनाया गया. इसे लेकर रघुवर सरकार शक के घेरे में है.

जब सरकार की फजीहत होने लगी और सरयू राय जैसे मंत्री ने अपनी सरकार की मंशा पर सवाल उठाना शुरू कर दिया तो मुख्य सचिव को 15 दिनों का नोटिस दिया गया. कई वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि राजबाला और लालू प्रसाद की निकटता के बारे में सभी जानते थे. फिर भी एक बिल्डर की लॉबिंग की वजह से कई अधिकारियों को दरकिनार कर इन्हें मुख्य सचिव बना दिया गया. ये लगातार विवाद में रही और ऑफ द रिकॉर्ड इनके कई किस्से कहानियां फिजा में तैरते रहे. चाहे इनके बेटे की कम्पनी को आर्थिक लाभ दिलाने के मामले में एक व्यवसायी का सार्वजनिक ट्विट हो या लाखों गरीबों का राशन कार्ड रिजेक्ट करने का मामला हो, सवाल लगातार उठते रहे लेकिन मुख्यमंत्री पता नहीं क्यों इन्हें बर्दाश्त करते रहे! इससे सरकार की साख पर सवाल खड़े हुए. अब जब मुख्य सचिव को कार्मिक विभाग ने नोटिस भेजा है, क्या राज्य सरकार को इन्हें तुरंत अपने पद से नहीं हटाना चाहिए.

ऐसे ही वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव सुखदेव सिंह के मामले में हुआ है. अच्छी छवि के अधिकारी माने जाने वाले सुखदेव सिंह पर देवघर के उपायुक्त रहते चारा घोटाले की निकासी को नज़रंदाज़ करने का आरोप है. मधु कोड़ा और हेमंत सोरेन के प्रधान सचिव रह चुके सुखदेव सिंह के बारे में सीबीआई ने पहली बार नोटिस किया है. इसलिए उन्हें संदेह का लाभ सरकार दे सकती है. लेकिन वित्त से इन्हें क्या तुरंत नहीं हटाया जाना चाहिए! ऐसे कई किस्से हैं जो सरकार के वादों और दावों की कलई खोलते हैं.

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