एनडीए में नीतीश की नयी पारी कब तक?

-2019 या 2020 तक?

आखिरकार नीतीश कुमार महागठबंधन के अपने साथियों राजद और कांग्रेस को छोड़कर अपने पुराने साथी भाजपा से हाथ मिलाकर छठी बार बिहार की सत्ता पर काबिज हुए। लेकिन छठी बार मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले नीतीश के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अब नीतीश के सामने सवाल है कि वो आगे की रणनीति 2019 के हिसाब से बनायें या 2020 को ध्यान में रख कर।

2019 से आशय है नीतीश की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी या कम से कम लोक सभा में जेडीयू सांसदों की संख्या से है। उसमें अभी दो साल का वक्त बाकी है और किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस्तीफे के बाद नीतीश ने कहा कि लालू से कोई संवादहीनता नहीं थी. यानी आगे भी मौके के हिसाब से सिद्धांतों की दुहाई देने की अलग परिभाषा गढ़ी जा सकती है। नीतीश ने पहले ही इतनी गुंजाइश कर रखी है। राहुल के धोखेबाजी के आरोप पर नीतीश ने यही कहा है कि वक्त आने पर सबको जवाब देंगे। यानी सही वक्त आने पर सही जवाब तैयार होगा।

2019 में अगर प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी न सही तो नीतीश के सामने सीटों के बंटवारे की चुनौती होगी। महागठबंधन में नीतीश की इतनी तो चलती ही थी कि जेडीयू के साथ- साथ वो कांग्रेस को भी ज्यादा सीटें दिलाने में सक्षम रहे । क्या एनडीए में बीजेपी नीतीश को इतनी छूट देगी? कहना मुश्किल है। अगर नीतीश छवि की दुहायी देना चाहेंगे तो बीजेपी कह सकती है कि मोदी से बड़ी उनकी छवि तो है नहीं। फिर तो बीजेपी जो दे नीतीश को उसी में संतोष करना पड़ेगा। शायद वैसे ही जैसे यूपी में समाजवादी पार्टी कांग्रेस को सीटें देते समय कर रही थी।

इसी तरह 2020 के विधान सभा चुनाव में भी नीतीश के लिए मुश्किल घड़ी होगी। लालू ने तो महागठबंधन के दबाव में नीतीश को नेता घोषित कर दिया था, क्या बीजेपी भी नीतीश को ये मौका देगी। वैसे इस पर तस्वीर 2019 के बाद ही साफ हो पाएगी। तब तक अगर नीतीश प्रभावी रहे तो बीजेपी समझौता कर सकती है वरना, अगर पंजाब जैसी प्रतिकूल परिस्थिति नहीं रही तो नेता वही होगा जिसकी सीटें ज्यादा होंगी। वैसे बीजेपी अगर कोई बहुत बड़ा ख्वाब देख रही है तो फिलहाल तो ये हवाई किला ही होगा। जनाधार के मामले में अगर नीतीश कमजोर हैं तो बीजेपी के पास भी मोदी लहर के अलावा कोई और बड़ा वजूद नहीं है।

कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या मोदी-शाह वाली भाजपा में नीतीश को स्वतंत्र होकर काम करने दिया जाएगा। क्या कि बीजेपी के साथ नीतीश का ताजा रिश्ता भी कम दिलचस्प नहीं है। सच तो ये है कि एनडीए में नीतीश की ये पारी तब तक चलती रहेगी जब तक उन्हें अच्छे से सूट करती रहेगी।

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