आपके उप प्रधानमंत्री बनने का क्या हुआ नीतीश जी!

बिहार और दिल्ली में कई महीने से नीतीश कुमार के डिप्टी पीएम बनने की बात होती रही। पर राजनीतिक विश्लेषक इसे गलत ठहराते रहे। क्या सचमुच ऐसा कोई ऑफर भाजपा ने नीतीश कुमार को दिया था। अगर हाँ तो क्यों, अगर नहीं तो जेडीयू वाले इस बात को क्यों प्रचारित करते रहे और कभी नीतीश ने इस बात का खंडन नहीं किया!

दरअसल सियासी हल्कों में ये बात तेजी से फैलती रही कि भाजपा ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उपप्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया है। आप सोच रहे होंगे नीतीश तो वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री हैं। तो ऐसा कैसे हो सकता है। आइए इसके पीछे के कारणों पर एक नजर डाल लें तो नीतीश को उपप्रधानमंत्री बनाने की ठोस वजहें भी गिनाई जा सकती है। नीतीश को अपने पाले में लाकर बीजेपी ने बिहार में फिर से सत्ता में वापसी कर ली है।

अटल बिहारी वाजपेयी के समय से ही नीतीश एनडीए खेमे के खास सिपहसलार रहे हैं। विपक्षी खेमे की ओर से नीतीश का नाम गाहे बगाहे प्रधानमंत्री के लिए चलता रहा है, लेकिन अब इस बारे में बात करना बेमानी होगी क्योंकि सारा का सारा राजनीतिक परिदृश्य पिछले एक से डेढ़ माह में बदल चुका है। लालू यादव की राजनीति को देखा जाए तो शुरू से ही उनकी राजनीतिक बिसात जातीय गोलबंदी के आसरे पे ही टिकी है, नीतीश को उपप्रधानमंत्री बनाकर उनके इस राजनीतिक हथियार को भोथरा किया जा सकता है। क्योंकि नीतीश खुद पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। बिहारी अस्मिता की बात करने वाले लालू की राजनीतिक धार नीतीश के उपप्रधानमंत्री बनते ही कुंद पड़ जाएगी, क्योंकि लालू अक्सर बिहार को ठगने, भेदभाव जैसे सियासी हथकंडे चलाते रहते हैं। जब किसी बिहारी को ही उपप्रधानमंत्री बना दिया जाए तो भेदभाव, बिहारी अस्मिता जैसे सारे मुद्दे गौण हो जाते हैं। सीटों के गणित की बात करें तो नीतीश के उपप्रधानमंत्री बनते ही बिहार की सियासी फिजा एकदम बदल सकती है, क्योंकि बिहार की जनता अपने राज्य से उपप्रधानमंत्री का चेहरा देखकर सारे विपक्ष की हवा निकाल देगी। क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव के समय बने महागठबंधन से बीजेपी को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। बीजेपी इस बार नीतीश को खोने का रिस्क नहीं लेना चाहती, उसे पता है कि नीतीश से एक बार गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी को बिहार की सत्ता से 4 साल दूर रहना पड़ा था और नीतीश का साथ पाकर बीजेपी खुद को बिहार में मज़बूत तौर पर आंकती है।

वैसे भी कोर्ट ने लालू को 11 साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है, लालू पर चारा घोटाले की तलवार लटक रही है, इसलिए बिहार में बीजेपी का कोई सियासी विकल्प है तो वे नीतीश कुमार ही हैं। उनको भी अपने पाले में लाकर बीजेपी ने एक तीर से कई शिकार किए हैं। पहला तो नीतीश को अपने पाले में लाने से महागठबंधन टूट गया। दूसरा नीतीश जैसा मजबूत साथी बिहार में वापस मिल गया। तीसरा महागठबंधन के रूप में वजूद ले रहा भविष्य का खतरा टल गया, जिसकी बानगी बीजेपी ने बिहार विधानसभा चुनाव में देखी थी।

सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार भी इसे अपने लिए एक नए अवसर की तौर पर देख रहे हैं। उन्हें लगता है कि सारी आलोचनाओं के बावजूद नरेंद्र मोदी को 2024 या इसके भी आगे हरा पाना विपक्ष के बूते में नहीं है। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर ये कहकर की नरेंद्र मोदी आने-वाले समय में भी अजेय हैं अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। नीतीश को लगता है कि पीएम ना सही डेप्युटी पीएम बनने का उनका ख्वाब पूरा होने जा रहा है। इससे उन्हें और उनकी पार्टी जदयू को राष्ट्रीय फलक पर आने का मौका मिलेगा। भाजपा के साथ रहते हुए नीतीश बिहार की सत्ता पर भी लंबे समय तक काबिज रहेंगे। उनका नियंत्रण बिहार की सत्ता पर बना रहेगा। उन्हें मालूम है कि लालू और उनके परिवार पर बड़ी मुसीबत आनेवाली है। झारखंड हाईकोर्ट में चल रहे चारा घोटाले से लेकर रेलवे और बेनामी संपत्ति के मामलों में लालू और उनका पूरा परिवार सीबीआई के शिकंजे में है। कानूनी जानकारों के अनुसार जेल जाने की आशंका ज्यादा है। ऐसे में नीतीश के लिए बिहार पर शासन करना और केंद्र में अपनी दखल बढ़ाना दोनों ही आसान हैं।

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