कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी: नीलांशु रंजन

आज़ाद भारत में एक अजीबोगरीब घटना हुई- एक ऐसी घटना जिसने पूरे देश को सकते में डाल दिया। टी वी व सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई कि देश की सबसे बड़ी अदालत के चार जजों का मीडिया के सामने आना कितना वाजिब है? लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर वे क्यों मीडिया से रूबरू हुए? सिर्फ़ यह कह देने से कि यह ग़लत हुआ, मैं समझता हूं कि यह हक़ीक़त से नज़रें मोड़ना है। आखि़र क्यों उन्हें मीडिया से मुखातिब होना पड़ा? क्यों उन्हें मीडिया के समक्ष अपने दर्द को छलकाना पड़ा? बस ज़्यादातर लोग अलाप रहे हैं कि जो भी हुआ वह ग़लत व अनैतिक हुआ। लेकिन इन चार जजों को परंपरा क्यों तोड़नी पड़ी, इस पर कोई विचार नहीं कर रहे हैं। कुछ तो उनकी मजबूरियां रही होंगी। जी हां, देश की सबसे बड़ी अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश ने प्रेस सम्मेलन कर बिना किसी लाग लपेट के कहा, उच्चतम न्यायालय में सब ठीक नहीं चल रहा है और इस संस्था को पटरी पर नहीं लाया गया तो लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा। इन चार न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि हमें मजबूर होना पड़ा ताकि बीस साल बाद हमें कोई यह न कहे कि हमने अपनी आत्मा को बेच दिया है। उन्होंने मीडिया को सात पन्ने का पत्र भी सौंपा जिसमें उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को सुधारात्मक क़दम उठाने की सलाह दी थी और उस मुत्तलिक उनसे उनलोगों ने बात भी की थी। लेकिन जब उसका कोई परिणाम नहीं निकला तो आखि़रकार मजबूर होकर एक दूसरे महत्वपूर्ण स्तंभ का सहारा लेना पड़ा। मुख्य न्यायाधीष से उनलोगों की मुख्य दो शिकायतें हैं जिसका ज़िक्र पत्र में है। पहला यह कि सुप्रीम कोर्ट में अपने वाले मामलों को जजों के पास भेजने में या बेंच बनाने में मुख्य न्यायाधीश द्वारा कथित तौर पर मनमानी रवैया अख़्तियार करना और बहुत ही ज़ूनियर न्यायाधीशों के पास उन्हें भेज देना है। पत्र में साफ़ लिखा है ‘हमें यह कहते हुए बहुत अफ़सोस है कि मुख्य न्यायाधीश ने राष्ट्र और इस संस्था के लिए दूरगामी परिणाम वाले मामलों को चुन कर बिना किसी तार्किक आधार के ‘अपने पसंदीदा‘ पीठों के हवाले किया। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए मेमोरेंडम ऑव प्रोसीजर तैयार करने के मामले में बाकी जजों से बात न करना।

अब पहला जो मामला है वो बहुत ही गंभीर है। आख़िर वे कौन से मामले हैं जिनका इस संस्था और राष्ट्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले थे और उन मामलों को अपने पंसदीदी पीठ में मुख्य न्यायाधीष द्वारा भेज दिया गया। इन जजों के आरोप से ज़ाहिर है कि देश की सबसे बड़ी अदालत में भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया व निष्पक्षता का घोर अभाव है। अगर देश की सबसे बड़ी अदालत भी निष्पक्ष होकर काम नहीं कर रही है तो खतरे की घंटी है। आखिर वे दूरगामी प्रभाव वाले कौन से मामले हैं जिनमें मुख्य न्यायाधीश को वरिष्ठतम न्यायाधीशों को दरकिनार कर अपने पसंदीदा पीठ में भेजने को मजबूर होना पड़ रहा है और क्यों? पत्रकारों द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या विवाद जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत से भी तो नहीं जुड़ा है, इस पर जस्टिस रंजन गोगोई ने ‘हां‘ में जवाब दिया। मतलब साफ़ है कि ये चारों वरिष्ठतम न्यायाधीश किस ओर इशारा कर रहे हैं। जस्टिस लोया सीबीआई के जज थे जो सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी इनकाउन्टर मामले की सुनवाई कर रहे थे। तो क्या यह माना जा सकता है कि उन चार न्यायाधीशों का इशारा कुछ और भी है? क्या कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना वाली बात तो नहीं है।

दूसरा जो आरोप है वह है जजों की नियुक्ति के लिए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर तैयार करने के मामले में बाकी जजों से बात न करना। उन्होंने पत्र में लिखा है कि मुख्य न्यायाधीश का यह कर्तव्य है कि वे स्थिति में सुधार करें तथा कोलेजियम के अन्य सदस्यों के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर सुधार के उपाय करें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोलेजियम के पांच सदस्यों में मुख्य न्यायाधीष के साथ ये चार वरिष्ठतम न्यायाधीश भी शामिल हैं जो सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में शामिल होते हैं। तो फिर इन्हें दरकिनार कैसे किया जा सकता है?

अब सवाल यह उठता है कि उन्हें मीडिया के सामने आना चाहिए था या नहीं? जैसा कि उन्होंने कहा कि वे लगातार कोशिश कर रहे थे कि मुख्य न्यायाधीश से बात कर चीजों को पटरी पे लाया जाए और 12 जनवरी की सुबह भी वे लोग मुख्य न्यायाधीश से मिले थे। लेकिन वे सुनने को तैयार नहीं थे। तो ऐसी स्थिति में वे क्या करते? अगर उनलोगों ने बंधी-बंधायी परंपरा को तोड़ा तो ज़रूर उनकी मजबूरी रही होगी। इसलिए उनके दर्द और उनके पक्ष को भी संवेदनशीलता से समझना होगा क्योंकि ये चारों न्यायाधीश अपनी इनटिगरिटी और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं।

दूसरी बात, जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत का मामला जब उनलोगों ने उठा दिया है, तो सरकार का फ़र्ज़ है कि वे पूरी ईमानदारी से इसकी जांच होने दें और मैं समझता हूं कि राहुल गांधी की मांग जायज़ है और उन्होंने बगैर कोई सियासत करते हुए बड़ी नम्रता से जांच की मांग की है। सरकार यह कहकर भले ही पल्ला झाड़ रही हो कि यह न्यायपालिका का अंदरूनी मामला है तो मैं समझता हूं कि सब कुछ समझते हुए भी नासमझ बनने की कवायद है यह। अगर लोग यह कह रहे हैं कि यह बहुत ही ग़लत हुआ तो सवाल है कि इतना ग़लत होने की नौबत ही क्यों आई और कौन है इसके लिए ज़िम्मेदार?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार हैं।

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