मिथिलांचल को चाहिए इन सवालों के जवाब

मां जानकी की मिथिला। महाकवि विद्यापति और मंडन मिश्र की मिथिला। जनकवि नागार्जुन और राजकमल चौधरी तथा फनेश्वरनाथ रेणु की मिथिला इनदिनों उदास है, निराश है। संस्कृति की अमरबेल ने मिथिला और मैथिलों को तो आपस में बांध कर रखा है लेकिन विकास के नाम पर बिहार सरकार ने हमेशा की तरह मिथिलांचल को उपेक्षित ही किया है।

दुनिया को ज्ञान और न्याय दर्शन सिखानेवाली मिथिला के साथ लगातार अन्याय हुआ है। आज़ादी के बाद से अबतक केवल केवल बाढ़ की चपेट में मिथिलांचल ने लाखों अपनों को खोया है। कई लाख घर ढह गये। लाखों मवेशी बह गए। पर बदले में क्या मिला। चुडा-गुड़ के कुछ पैकेट। नाउम्मीदी के अंधेरों में कुछ मोमबत्ती के पैकेट। संसार के किसी कोने में आज तक इतना बड़ा महाविनाश नहीं हुआ। बिहार विधान परिषद् के आंकड़े बताते हैं यह सब। पर मानव निर्मित इस बाढ़ विनाश के लिए किसी को कोई सज़ा नहीं मिली आजतक। प्रेम के गीतों की धरती मिथिला को ये मंजूर नहीं।

बिहार के नदियों पर रिसर्च करने में अपनी जिन्दगी के 40 साल लगा चुके जल पुरुष दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं कि मिथिलांचल का बाढ़ संकट मानव निर्मित है। जब कोशी को बाँधा जा रहा था, उसके तटबंध को ऊँचा किया जा रहा था, तभी यह आशंका जताई गई थी कि यह तटबंध आनेवाले दिनों में महाविनाश का कारण बनेगा। पर किसी ने सुना नहीं। मिथिला को मृत्यु का प्रयोग शिविर बनाया गया। नतीजा सबके सामने है।

ललितनारायण मिश्र के बाद मिथिला ने अपनी राजनीतिक आवाज़ खो दी। नहीं तो बिहार का इतना बड़ा मिथिला क्षेत्र विकास के क्यूँ अंतहीन इंतज़ार करता रहा। शिवहर, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुवनी, बेगुसराय, खगडिया, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया, कटिहार, किशनगंज जैसे जिलों को मिलाकर अलग मिथिलांचल की मांग लंबे अरसे से होती रही है। बाद के दिनों में मिथिलांचल के दिग्गज नेता ताराकांत झा की अगुवाई में मिथिला की समस्याओं को ताकत से उठाया गया। दल, जाति- धर्म की सीमा तोडकर हर मिथिलावासी इस आन्दोलन से जुड़ा। सवाल अब भी हैं...पर नेतृत्व का संकट है। कई चेहरे मिथिला के अलग-अलग इलाके से मौलिक सवालों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं...पर टुकड़ों की लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होनेवाला। मिथिला समाज को एकजुट करने की मुहिम में जुटे सुजीत कुमार झा कहते हैं कि तकरीबन 2.5 से 3 करोड़ मिथिलावासी हैं बिहार में। पर आज भी पूरा मिथिला बाढ़ की वजह से ही सुर्ख़ियों में आता है। हमारे मिथिलांचल की छवि सरकारों ने याचक की बना दी है। लेकिन बिहार सरकार को समझना होगा कि हम याचक नहीं हैं। हमारी मजबूत सांस्कृतिक विरासत हमें जोड़े हुए है मजबूती से। इसी साझा ताक़त से देश के अलग-अलग हिस्से में रह रहे मिथिलावासी अपनी मां और माटी को सहेजेंगे और समृध बनायेंगे।

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