हाथी को नहीं मिल रहा साथी?

-बहन मायावती का बिखर रहा कुनबा

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया आज अपनी पार्टी में ही अकेली पड़ती जा रही हैं। एक- एक कर पार्टी के सारे भरोसेमंद नेता मायावती के गुस्से का शिकार हो रहे हैं और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दकी जैसे नेताओं के बाद ताजा शिकार हैं बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव और यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री इंद्रजीत सरोज| इंद्रजीत सरोज न सिर्फ बीएसपी के संस्थापक सदस्यों में गिने जाते थे, बल्कि उन्हें मायावती के गुरू कांशीराम के करीबियों में शुमार किया जाता था। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि वह क्या वजह है जिसके चलते मायावती के गुस्से का शिकार पार्टी के कद्दावर नेता हो रहे हैं और पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं?

जानकारों की मानें तो बहनजी के कहर का शिकार कब, कौन, कहां और कैसे हो जाए कहा नहीं जा सकता। दरअसल मायावती ने उन नेताओं को भी नहीं बख्शा, जिन्हें उनका करीबी माना जाता था। पार्टी में जिस नेता पर माया की नजर टेढ़ी हुई, उसे बाहर जाना ही पड़ा है।

कांशीराम ने दलित समाज के हक के लिए 1984 में दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के वैचारिक नेताओं को जोड़कर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। कई राज्यों में बीएसपी का जनाधार बढ़ने लगा। इसी कड़ी में कांशीराम के संपर्क में मायावती आईं तो उत्तर प्रदेश में बीएसपी को एक नई ताकत मिली। 1993 में बीएसपी ने एसपी के साथ मिलकर यूपी में सरकार बनाई और फिर तो बीएसपी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। तो सवाल उठता है कि जब आज पार्टी को कद्दावर और वफादार नेताओं की जरुरत है तो फिर क्यों बहुजन समाज पार्टी का कुनबा बिखरने लगा।

आज बसपा से अलग होने वाले नेताओं ने मायावती को ही कठघरे में खड़ा कर बसपा की मुश्किलें बढ़ा दी। सरोज की बगावत से बसपा की दलित जोड़ो मुहिम को बड़ा झटका है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में लगातार मिली करारी शिकस्त के बाद से बसपा को उबर पाने का मौका नहीं मिला। दलित वोटबैंक खिसकने की घबराहट के बीच मायावती के लिए वरिष्ठ व समर्पित नेताओं को एक-एक कर अलग होते जाना खतरे की घंटी है। कांशीराम के साथियों में से अब सिर्फ सुखदेव राजभर ही पार्टी में बचे हैं। ऐसे में मायावती बीएसपी को किन कर्णधारों के साथ आगे बढ़ायेगी ये वही जानती हैं या आने वाला वक्त बतायेगा।

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