लोहिया और किशन पटनायक की भी तब कांग्रेस सरकार ने नहीं सुनी थी

भूख से मौतों की तकनीकी व्याख्या पर सरकारी सोच कैसी होती है, इसपर हमने पहले भी बहस की थी। लेकिन वरिष्ठ समाजशास्त्री नलिन जी ने कुछ समय पहले यह दस्तावेज भेजा। यह ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। यह राममनोहर लोहिया जी द्वारा 1966 में कालाहांडी के महाअकाल के वक़्त संसद में पूछे गए प्रश्न से सम्बंधित है। तब की कांग्रेस सरकार ने उसे भी भूख से मौत नहीं माना था। तब जनसंघ (आज की भाजपा ) इसे भूख से मौत मानता था। आज भाजपा की रांची और दिल्ली दोनों जगह सरकार है, पर वो सिमडेगा में संतोषी की मौत को भूख से हुई मौत नहीं मानती। ऐसे में क्या यह साबित नहीं होता कि सत्ता का स्वभाव एक सा होता है।

“जनवरी-फरवरी 1966 में ओडिशा की स्थिति नाजुक होने लगी और मार्च में भूख से होने वाले मौतों के समाचार आने लगे। देश को आजाद हुए बीस साल होने जा रहे थे। लेकिन आजाद हिन्दुस्तान के शाशक भुखमरी की घटनाओं पर संसद में एक घंटे की बहस भी करने को तैयार नही थे। लोकसभा में खाद्य व कृषि मंत्री सी सुब्रह्मण्यम ने ओडिशा में व्यापक कुपोषण की स्थति को तो स्वीकार किया पर अरसे से चले आ रहे कुपोषण के बाद होने वाली मौतों को वह भुखमरी कहने और मानने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे। वह इन्हें बीमारी से होने वाली मृत्यु ही कहते रहे”।

“लान्जीगढ़ प्रखंड में सैकड़ो मौतों का कारण बताते हुए सरकार ने विधान सभा में कहा है कि एक अपरिचित बीमारी आ गयी है, भूख से अधमरे शरीर का कब क्या बिगड़ सकता है, उसका बीमारी के रूप में निरूपण करना डॉक्टरों के लिए भी मुश्किल काम है। अभी तक भुखमरी से मौत के बारे में सरकार का ब्यान होता था कि मृत्यु के पहले कोइ बीमारी थी। अतः मौत का कारण भुखमरी नहीं है। विशुध भूख से मौत तो शायद अनशन सत्याग्रह करने वालो को होगी जिनका पेट खाली पाया जाएगा। भुखमरी से ग्रस्त आदमी पेट खाली नहीं रखना चाहता है। वह अखाद्य, कुखाद्य खाकर बीमार होता है। भुखमरी का प्रमाण पत्र कोई डॉक्टर नहीं दे सकता है। भूखमरी का पता तो तब लगेगा जब मृतक के मृत्यु के पूर्व छह महीने के भोजन और रोजगार की समीक्षा होगी।

इसी संदर्भ में किशन पटनायक ने भुखमरी से हुई मौत पर लोक सभा में हुई चर्चा का भी जिक्र किया है।
डॉक्टर राम मनोहर लोहिया:- मंत्री महोदय ने लम्बे समय कम खाने का जिक्र किया है, prolonged malnutrition का अपने बयान में जिक्र किया है। इसमें और भुखमरी यानि starvation में क्या फर्क है। अगर starvation शब्द का इस्तेमाल अपने बयान में कर देते तो तो उसके कानूनी और आर्थिक क्या- क्या नतीजे निकलते। यह वह बताएं।
भुखमरी शब्द आ जाने से कानूनी और आर्थिक क्या क्या परिवर्तन होंगे? क्या उससे केंद्र की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी अगर वह शब्द इस्तेमाल हो जाएगा….और बढ़ेगी तो किन किन दिशाओं में वह बढ़ेगी।

“सरकार और लोकसभा के अध्यक्ष ने काला हांडी में भूख से होने वाली मौतों पर बहस की अनुमति नहीं दी। इसके बावजूद टोका टोकी और शोर शराबे के बीच जो आंशिक चर्चा या बहस हो पाई उसके अंत में यह निष्कर्ष निकला कि सरकार भूख को कभी मौतों का कारण नहीं मानेगी। भूख से मौत के सवाल पर शायद यह लोक सभी की पहली आधी अधूरी बहस थी। आज तक सरकार यह नहीं मान रही है कि उसके राज में कही भुखमरी है।”

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