शराबबंदी तय करेगा जदयू की सियासी तकदीर

आगामी चुनाव के मद्देनजर जदयू ने झारखंड में पार्टी को सजाने-सवांरने की कवायद शुरू कर दी है। शराब बंदी, दहेज प्रथा खत्म करने, बाल विवाह, पिछड़ों को आरक्षण जैसे मुद्दे के सहारे राज्य में सियासी जमीन तलाशा जायेगा। वैसे क्षेत्र ढूंढे जाएंगे जहां पार्टी की थोड़ी- बहुत हैसियत है। इसके लिए कुछ पुराने मित्रों की खोजबीन भी शुरु की जाएगी। तो कुछ नए चेहरों को शामिल कर जोश भरा जाएगा।

बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद झारखंड में भी नए सिरे से समीकरण सेट करने पर जोर होगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुछ महीने पहले तक रघुवर सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल के साथ बिहार में आगे बढ़ने की मुहिम पर भी फोकस किया जा रहा था। राजद और कांग्रेस के साथ तो जदयू बिहार में सरकार में था ही। झारखंड में झामुमो और झाविमो को भी एक मंच पर लगातार कोशिश हो रही थी। ये कोशिश बहुत हद तक कामयाब होती भी दिख रही थी। झारखंड में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू को मजबूत करने के लिए कुछ रैलियां भी की।

पर अब पूरा सियासी माहौल एकदम से बदल गया है। जो रघुवर सरकार उनके निशाने पर थी अब उनके हाथ को थामना है। चुनाव में भी जाना है। पार्टी मिशन 2019 को लेकर झारखंड में अपनी जमीन तलाशने में जुट गई है। शराब बंदी, दहेज प्रथा खत्म करने, बाल विवाह, पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण, महिलाओं को सरकारी नौकरी में बिहार के तर्ज पर 35 प्रतिशत आरक्षण और विधान सभा सीटों की संख्या 81 से बढ़ाकर 160 करने के मुद्दे के साथ जमीन पर उतरेगी।

ये देखना दिलचस्प होगा कि जदयू सरकार पर शराबबंदी के लिए कैसे दबाव बनायेगी जबकि सरकार स्वयं शराब बेच रही है। झारखंड में बिहार की तर्ज पर पार्टी के अभियान का कितना असर होगा ये तो भविष्य बतायेगा। लेकिन जिस वोट बैंक या जातीय समीकरण के आधार पर जदयू सियासी किस्मत आजमायेगी उस पर पहले से ही आजसू, जेएमएम का कब्जा है। भाजपा के पास जो जातीय समीकरण है उसका जदयू से कोई सारोकार नहीं है। ऐसे में जदयू जैसे दल को झारखंड में नीतीश कुमार के चेहरे के साथ जमीन तैयार करना टेढ़ी खीर है।

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