सियासी संकेतों के साथ दिखा लालू का दम

रविवार को पटना के गांधी मैदान में बेहद सफल रैली कर लालू प्रसाद ने अपने व्यापक जनाधार का दम तो दिखाया ही साथ ही वो यह साबित करने में भी सफल रहे कि भाजपा के खिलाफ जंग में वो विपक्ष को इकठ्ठा कर सकते हैं, और जरुरत पड़ने पर भाजपा विरोध की केन्द्रीय धुरी बन सकते हैं। बाढ़ से जूझते बिहार में तमाम कठिनाई झेलकर जिस बड़ी तादाद में लोग लालू के आह्वान पर जुटे, वह विस्मयकारी है। जाहिर तौर पर जो लोग लालू का मर्शिया पढ़ रहे थे, उन्हें निराशा हाथ लगी होगी।

लालू प्रसाद के बुलावे पर विपक्ष के सभी बड़े नेता जुटे। ममता बनर्जी आयीं तो उनके विरोधी डी राजा भी आये। अखिलेश यादव आये और लोकदल से चौधरी जयंत भी। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद और सी पी चौधरी आये तो जेडीयू नेता शरद यादव और अली अनवर भी। एनसीपी के तारिक अनवर समेत कई कद्दावर नेताओं को एक साथ जुटाकर पटना के गांधी मैदान से लाउड एंड क्लियर मेसेज देने की कोशिश की गई।

जाहिर है भाजपा इस महारैली से निराश हुई होगी। लालू और उनके कुनबे पर केस लादकर भाजपा नेता और उनके समर्थक शायद ये उम्मीद कर रहे थे कि लालू के करिश्मे का अंत हो गया लेकिन जो लोग बिहार की राजनीति को समझते हैं, उन्हें पता है कि कई बार लालू ने जन ताकत से तब दोबारा वापसी की, जब उनके सियासी अवसान के उपलक्ष्य में लड्डू बांटे गए थे।

इस बार लालू के उत्तराधिकारी तेज़स्वी ने भी अपनी मेच्योर  राजनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया। बेहद विनम्रता लेकिन मजबूती से उन्होंने अपनी बात रखी और लंबे सियासी संग्राम के लिए सबका साथ मांगा। बेहद सधे अंदाज़ में उन्होंने नीतीश की वादाखिलाफी को सबके सामने रखा और प्रकारांतर से सबको यह सन्देश भी दिया कि नीतीश ने ही उनपर सारा केस करवाया।

गांधी मैदान की सफल रैली से लालू प्रसाद तो खुश हुए ही प्रकारांतर से नीतीश भी इससे प्रसन्न ही होंगे। क्योंकि नीतीश को पता है कि जितना लालू मजबूत दिखेंगे उतनी ही भाजपा की नज़र में नीतीश की स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। लालू जितना कमजोर होंगे, भाजपा की नज़र में नीतीश भी उतना ही कमजोर होते जायेंगे। नीतीश ने लालू को अपनी जाति का नेता कहा था। आज यह भी गलत साबित हुआ। लेकिन नीतीश के उस बयान ने बंटे हुए यादवों को गोलबंद जरुर कर दिया।

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