समोसे में आलू तो है पर बिहार में लालू कहाँ हैं !

-दही-चूड़ा की जगह सवालों की लालू संक्रान्ति

अपूर्व परासर

68 वां बसंत देख चुके राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के सियासी सितारे गर्दिश में हैं। कभी लालू के घर का दही चूड़ा खाने के लिए लम्बी-लम्बी क़तार लगती थी नेताओं की। मकरसंक्रांति में कई बड़े नेता उनके यहां शिरकत करते थे और दही-चूड़ा और तिलकुट का आनंद लेते थे। पर इस बार मकर संक्रान्ति के मौके पर पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड में उनके आवास पर सन्नाटा दिखा। अपने राजनीतिक सफर में लालू ने कई उतार चढ़ाव देखा हैं। सन: 1997 में जनता दल से अलग होने की वजह भी चारा घोटाला ही थी, जिसके बाद 1997 में ही उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल पार्टी का निर्माण किया और आज जेल में रहने की वजह भी चारा घोटाला ही हैं। पर अब उनकी पार्टी बन नहीं रही बल्कि टूटने के कगार पर हैं। उनके दोनों बेटों तेज़ प्रताप और तेजस्वी यादव से उम्मीद जताई जा रही हैं कि वह राजद को सही दिशा दे पर उनकी नाकामी इस बात से दर्शाई जा सकती हैं कि हर छोटी-छोटी बात पर ये उग्र हो जाते हैं, बिहार की राजनीति को अच्छे से समझ पाना इनके लिए चुनौती है। बीते 6 जनवरी को रांची कोर्ट द्वारा दिये गए फैसले ने लालू व उनके चाहने वालो को चौका दिया हैं। लालू चारा घोटाले के दोषी पाए गए और उन्हें साढ़े तीन साल का कारावास और पाँच लाख रुपये की सजा सुनाई गई। इस फैसले के ख़िलाफ़ वह हाई कोर्ट जा चुके हैं.

एक नजर चारा घोटाले के मामले पे डालते हैं जिसने लालू की जिंदगी तबाह कर दी हैं।

1- करीब 900 करोड़ रुपये के चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव और कई अन्य नेता मुख्य आरोपी हैं। कहा जा सकता है कि इस घोटाले के चलते ही बिहार पर लालू के एकछत्र राज का अंत हुआ था।

2- साल 1996 में सामने आया चारा घोटाला पिछले करीब 20 साल से जारी था। इसमें जानवरों के लिए चारा, दवाएं और पशुपालन से जुड़े उपकरणों को लेकर घोटाले को अंजाम दिया गया। इसमें नौकरशाहों, नेताओं और इस बिजनेस से जुड़े लोग भी शामिल थे।

3- साल 2013 में इस मामले से जुड़े 53 में से 44 मामलों में सुनवाई पूरी हुई। मामले से जुड़े 500 से ज्यादा लोगों को दोषी पाया गया और विभिन्न अदालतों ने उन्हें सजा सुनाई। इसी साल अक्टूबर में चारा घोटाले से ही जुड़े एक मामले में 37 करोड़ रुपये के गबन को लेकर लालू यादव को दोषी पाते हुए सजा सुनाई गई। बाद में इसी साल दिसंबर में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई।

4- जांच के दौरान सीबीआई ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के इस घोटाले के संबंधों का खुलासा किया। इसके बाद 10 मई 1997 को सीबीआई ने बिहार के राज्यपाल से लालू के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसी दिन इस मामले से जुड़े बिजनेसमैन हरीश खंडेलवाल एक रेल पटरी पर मृत पाए गए।

5- राज्यपाल की अनुमति मिलते ही 17 जून 1997 को सीबीआई ने बिहार सरकार के पांच बड़े अधिकारियों को हिरासत में ले लिया। इनमें महेश प्रसाद, के. अरुमुगम, बेक जुलियस, फूलचंद सिंह और रामराज राम के नाम शामिल हैं।

6- 23 जून 1997 को सीबीआई ने लालू यादव और 55 अन्य के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्रदेव प्रसाद वर्मा भी थे। जगन्नाथ मिश्रा को अग्रिम जमानत मिल गई, लेकिन लालू की अग्रिम जमानत याचिका खारिज हो गई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया। इसी दिन बिहार पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अगले दिन उन्हें जेल भेज दिया गया।

7- चारा घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री लालू यादव के खिलाफ रोष बढ़ने लगा तो उनकी पार्टी जनता दल में भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने को लेकर आवाजें उठने लगीं। इस बीच लालू ने 5 जुलाई को जनता दल के लगभग सभी विधायकों को लेकर अपनी अलग पार्टी 'राष्ट्रीय जनता दल' बना ली।

8- अलग पार्टी बनाने के बावजूद भी लालू यादव की मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं बच पायी। आखिरकार 25 जुलाई को इन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनवा दिया। 28 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी की सरकार ने कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के सहयोग से विश्वासमत हासिल कर लिया।

9- 135 दिन न्यायिक हिरासत में रहने के बाद लालू यादव 12 दिसंबर 1997 को रिहा हुए। इसके बाद 28 अक्टूबर 1998 को उन्हें चारा घोटाले के ही एक अन्य मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पटना की बेऊर जेल में रखा गया। जमानत मिलने के बाद 5 अप्रैल 2000 को उन्हें आय से अधिक संपत्ति मामले में एक बार फिर गिरफ्तार किया गया। इस बार उन्हें 11 दिन जेल में बिताने पड़े। इसके बाद 28 नवंबर 2000 को लालू यादव ने चारा घोटाला मामले में ही 1 दिन और जेल में गुजारा।

10- चारा घोटाले से जुड़े अलग-अलग मामलों में लालू यादव और जगन्नाथ मिश्रा से साल 2000 में पुलिस ने कई बार पूछताछ की। साल 2007 में 58 पूर्व अधिकारियों और सप्लायरों को दोषी ठहराया गया और 5-6 साल की सजा सुनाई गई। मामला हाथ में लेने के 16 साल बाद एक मार्च 2012 को सीबीआई ने पटना कोर्ट में लालू यादव, जगन्नाथ मिश्रा सहित 32 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।

यूँ तो कांग्रेस के राज में 2004 से 2009 रेलमंत्री का भार उन्ही ने संभाला और भारतीय रेल को मुनाफे की राह पर ले गए। उस वक्त उन्होंने गरीब रथ नामक रेल की शुरुवात की जो उन्होंने यह कह के शुरू किया कि इससे गरीब लोग लंबी दूरी की यात्रा का आनंद वातानुकूलित रेल में किफ़ायती दर पे कर सकेंगे। आज भी ऐसा देखने को मिलता हैं। भले उसमे गरीबो से ज्यादा अमीर सफर करते हों। यादवों के मसीहा माने जाने वाले लालू को अब खुद के लिए किसी मसीहा की तलाश हैं। उनको स्वास्थ्य को लेकर भी गहरी चिंता रहती हैं। उन्हें डॉक्टरों द्वारा सख्त हिदायत है की किसी भी तरह का मानसिक दबाव न ले पर वक्त से बड़ा कुछ नहीं और इसके आगे सब को झुकना पड़ता हैं। देखा जाए तो यादव समुदाय के हर बड़े नेता अब सत्ता में नहीं हैं। बात बिहार की हो या दूसरे राज्य जैसे उत्तरप्रदेश की हो जहां मुलायम और अखिलेश यादव की तूती बोलती थी आज वहां भी भाजपा की सरकार हैं। जनता दल यूनाइटेड के पूर्व राष्ट्रीय अध्य्क्ष शरद यादव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक थे पर आज उनकी भी नैया डूबती नजर आती हैं। शरद ने बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के नीतीश के फैसले का विरोध किया था और पार्टी से बगावत कर दी थी जिसके बाद जदयू ने शरद को अगस्त में राज्यसभा में पार्टी नेता के पद से हटा दिया था। नीतीश गुट ने राज्यसभा सचिव से शरद की सदस्यता खत्म करने की अपील की थी। जदयू से अलग होने के बाद खबर यह भी हैं कि शरद खुद की पार्टी बनाने जा रहे हैं। भारत निर्वाचन आयोग को पार्टी के संभावित नाम "समाजवादी जनता दल, लोकतांत्रिक जनता दल, जनतांत्रिक जनता दल, लोकशाही जनता दल" दिए हैं। आशा हैं जल्द ही शरद यादव इस पर विचार करेंगे पर बिहार में उनकी भी राह लालू की तरह ही मुश्किल हैं। सही मुद्दे पर कार्य करना उन्हें सीखना होना। जात पात की राजनीति अब पुरानी बात हैं। यादव और मुस्लिम समाज के लोगो से राजनीति करने वाले लालू की यह बात प्रचलित थी कि "जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेगा बिहार में लालू"। आज समोसे में आलू तो हैं पर बिहार में लालू नहीं।

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