कुडमी- कोइरी वोट बैंक 22 सीटों पर दिखा सकता है करिश्मा

झारखंड की राजनीति इनदिनों गठबंधन के सहयोगियों को नीचे दिखाने के खेल पर टिकी है। एक तरफ एनडीए अपने सहयोगी आजसू को लगातार दबाने की कोशिश कर रहा है, लगातार सहयोगी दलों की उपेक्षा कर रहा है, वहीँ सहयोगी आजसू भी लगातार एनडीए सरकार की नीतियों की सरेआम मुखालफत कर रहा है। चाहे सीएनटी और एसपीटी में संशोधन का मामला हो या स्थानीयता को परिभाषित करने का मामला हो, बड़े कॉर्पोरेट घरानों को जमीन देने का मामला हो या मोमेंटम झारखंड में उद्योग घरानों के लिए रेड कारपेट बिछाने का मामला हो, हर फैसले का आजसू ने सड़क पर विरोध किया। कई बार तो ऐसा लगा जैसे ये मित्र दल नहीं शत्रु दल हैं। ऐसा क्यों!

इस सम्बन्ध में झारखंड के राजनीतिक जानकार मनोज सिंह कहते हैं कि भाजपा और उसके सहयोगी दल खासकर आजसू का समन्वय कहीं नहीं दिख रहा है। इनका मानना है कि भाजपा के पास इस बार बड़ा मौका था, आजसू के सहारे कुडमी-कोइरी वोटों को एकजुट रख ये लोग आसानी से 50 का आंकड़ा पार कर जाते, पर भाजपा के रणनीतिकारों ने ये मौका गंवाकर झामुमो को बैठे बिठाए वाक ओवर दे दिया। ये लोग आजसू की उपेक्षा करते करते इनके वोट बैंक की भी उपेक्षा करने लगे। आदिवासी तो इनके विरोध में थे ही झारखंड के कुडमी कोइरी वोट बैंक को भी लगने लगा कि एनडीए से ज्यादा सम्मान तो उन्हें झामुमो में ही मिल रहा था। मनोज कहते हैं कि अब भी भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी चाहिए और सुदेश महतो को सम्मान देकर इस ढहते वोटबैंक को बचाना चाहिए।

वास्तविकता यह है कि झारखंड की 22 सीट ऐसी हैं जो कुडमी-कोइरी बहुल हैं। संथाल परगना की 2 सीट, धनबाद कोयलांचल की बेरमो, टुंडी, गोमिया, गिरिडीह जैसी 6 सीटें कोल्हान की 5 सीट, चतरा और पलामू इलाके की सीटों को मिलाकर यहाँ कोइरी-कुडमी वोट बैंक का एग्रेसिव टर्न अराउंड कमाल कर सकता है। पर सुदेश महतो और उपेन्द्र कुशवाहा जैसे नेता ही एनडीए फोल्डर को इन इलाकों से बेहतर नतीजे दे सकते हैं।

भाजपा आखिर इस राजनीतिक गलती को क्यों नहीं समझ रही है! राजनीतिक विश्लेषक दीपक प्रियदर्शी कहते हैं कि दरअसल इस पार्टी के रणनीतिकार अभी भी बहुमत के सम्मोहन में हैं। अधिकारी विकास का इन्द्रधनुष दिखा रहे हैं। पार्टी को लग रहा है कि उसे किसी सहयोगी की जरुरत नहीं है। इसी अहंकार में मुख्यमंत्री अपने किसी सहयोगी की नहीं सुन रहे। समन्वय की जिनकी जिम्मेवारी थी वो जब इस कागजी इन्द्रधनुष के सम्मोहन से निकलेंगे तभी तो समन्वय पर बात होगी। लेकिन अहंकार की आंधी तब तक सियासत की सारी सम्भावनाओं को उड़ाकर ना ले जाए। आप खुद ऐसे समझिये कि समन्वय समिति की कितनी बैठक हुई, यह भाजपा प्रदेश कार्यालय को भी नहीं पता। ऐसी उदासीनता एनडीए की जीत की सम्भावनाओं पर लगातार ग्रहण लगा रही है।

विकास के सरकार के अपने मानक होते हैं। डॉ रमन सिंह जैसे लोग इसे व्यवहारिक राजनीतिक धरातल पर रखकर देखते हैं। तभी वो राजनीति की लम्बी पारी खेलते हैं। ऐसे नेताओं को अधिकारियों का फार्मूला भी पता होता और जनता के गुस्से और प्यार का भी रियलिटी चेक ये करते रहते हैं। बदकिस्मती से झारखंड में विकास की एकांगी गंगा बह रही है। यानि अधिकारी जो आंकड़े रख रहे हैं, मुख्यमंत्री और उनके कैबिनेट सहयोगी वही बक रहे हैं।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण सिमडेगा में राशन के अभाव में मरी संतोषी नायक का है। संतोषी नायक जैसे तकरीबन 11 लाख परिवारों का राशन कार्ड तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया गया। मुख्य सचिव ने बिना विभागीय मंत्री की जानकारी के यह तय कर दिया कि जिन्हें राशन कार्ड चाहिए उन्हें आधार कार्ड दिखाना होगा। बाद में विभागीय मंत्री सरयू राय ने मुख्य सचिव के द्वारा की गयी अन्य गडबडियों को उजागर करने की धमकी दी तो आनन-फानन में यह फरमान वापस हुआ। जब सरकार के अंदर इनती सम्वेदनहीनता है, अधिकारी मंत्री की नहीं सुन रहे। विभागीय सचिव मंत्री के आदेशों को फाडकर फेंक देते हैं, ऐसे में विकास का वास्तविक मूल्यांकन आखिर किसके भरोसे कर रही है सरकार!

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