ST/SC छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही सरकारः बाबूलाल

एससी-एसटी एक्ट में संशोधन किए जाने के विरोध में दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान रांची में हुए प्रदर्शन और पुलिस द्वारा स्टूडेंट्स पर की गयी लाठी चार्ज की घटना के विरोध में गुरुवार विभिन्न आदिवासी संगठनों सहित पूरे विपक्ष ने छह सूत्री मांग को लेकर राजभवन मार्च किया।

इस मौके पर जेवीएम सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने कहा कि भारत बंद के दौरान पुलिस की कार्रवाई बेहद दुखद है। राज्य सरकार की शह पर इस तरह की घटना को अंजाम दिया गया है। उन्होंने कहा कि हॉस्टल में रह रही छात्राओं के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार की घटना लोकतंत्र की मर्यादा को तार-तार करने वाली है। यह एसटी/एससी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

वहीं पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने कहा कि रघुवर दास की बीजेपी सरकार ने मर्यादा की सारी हदें पार कर दी है। ऐसी सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है। अधिकारों की बात करने वाले छात्र-छात्राओं को मारकर घायल कर देने वाली खूनी सरकार को राज्य की जनता सबक सिखायेगी। उन्होंने कहा कि घायलों को पांच-पांच लाख रुपये मुआवजा दे सरकार।

मौके पर अन्य वक्ताओं ने सरकार को कोसते हुए कहा कि प्रदेश में बीजेपी आपातकाल लाने की कोशिश कर है। इस मौके पर छह सूत्री मांग पत्र सौंपा गया। इस दौरान विधि व्यवस्था पर नजर रखने के लिए मजिस्ट्रेट, सदर डीएसपी, कोतवाली डीएसपी, लालपूर थाना प्रभारी, कोतवाली थाना प्रभारी, गोंदा थाना प्रभारी भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गयी। रैली के मद्देनजर शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर बैरिकेटिंग की गयी थी। अप्रिय घटना से निपटने के लिए फायर ब्रिगेड की गाड़ी को भी मौके पर रखा गया है।


प्रदर्शन कर रहे संगठनों ने अपने छह सूत्री मांग पत्र में सदर एसडीओ व डीएसपी को अविलंब बर्खास्त करने, गिरफ्तार छात्र संजय महली को अविलंब बिना शर्त रिहा करने, घायल छात्र-छात्राओं का सरकारी खर्च पर समुचित इलाज कराने, छात्र-छात्राओं व अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज झूठे मुकदमे वापस लेने, इस घटना की जांच रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कमिटी गठित कर करने, घायलों को अविलंब पांच-पांच लाख का मुआवजा उपलब्ध कराने की मांग की है। इस मौके पर बंधु तिर्की सहित झाविमो, गीताश्री उरांव, अंतु तिर्की, आदिवासी जन परिषद के प्रेम शाही मुंडा, दयामनी बारला व वासवी कीड़ो सहित अन्य पार्टियों के नेताओं, आदिवासी संगठनों के अलावा सैकड़ों की संख्या में छात्र और छात्राएं मौजूद थी।

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