जरा आप भी जानिए क्यों मनाते है मजदूर दिवस

1 मई अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। पिछले 132 साल से अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जा रहा है। मजदूर दिवस की शुरूआत 1877 में मजदूरों ने काम के घंटे तय करने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था। 1 मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मजदूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू कर दिया था। इस हड़ताल में 11,00 फैक्टरियों के कम से कम 3,80,000 मजदूर शामिल हुए और इस तरह पहली मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत हुई।

भारत में मजदूर दिवस कामकाजी लोगों के सम्‍मान में मनाया जाता है। भारत में मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत सबसे पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को हुई थी। उस समय इसको मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित किया गया था।

इसकी शुरूआत भारतीय मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी। भारत में मद्रास हाईकोर्ट के सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया गया और एक संकल्प पास करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी मजदूर दिवस के तौर पर मनाया जाए और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाए। उस समय भारत में मजदूरों की जंग लड़ने के लिए कई नेता सामने आए जिनमें बड़ा नाम दत्तात्रेय नारायण सामंत उर्फ डॉक्टर साहेब और जॉर्ज फर्नांडिस का था।

भारत के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस अब हमारे बीच नहीं रहे। वाजपेयी सरकार के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस देश के रक्षामंत्री थे। जॉर्ज फर्नांडीस सत्ता में रहे या विपक्ष में, हमेशा बेझिझक अपनी बात कहते रहे। पूर्व ट्रेड यूनियन नेता, राजनेता, पत्रकार, कृषिविद फर्नांडीस जनता दल के प्रमुख सदस्य भी थे। उन्होंने ही समता पार्टी की स्थापना की थी। अपने राजनीतिक करियर में उन्होंने रेलवे, उद्योग, रक्षा, संचार जैसे अहम मंत्रालय संभाले। जॉर्ज फर्नांडीस ने 1967 से 2004 तक एक नहीं बल्कि 9 बार लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की।

8 मई 1974 को देश में जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में अब तक की सबसे बड़ी रेल हड़ताल शुरू हुई थी। जॉर्ज उस समय रेल मजदूरों के संगठन ऑल इंडिया रेलवे फेडरेशन के अध्यक्ष थे। देश में हुए इस आंदोलन के बाद भारत की राजनीति की दिशा ही बदल गई। कहा जाता है कि इस आंदोलन ने ही देश में इमरजेंसी की नींव डाली थी।

जॉर्ज फर्नांडीस की अगुआई में हुई इस हड़ताल ने पूरे देश के मजदूर आंदोलन और भारतीय राजनीति पर प्रभाव डाला था। 1974 में हुई इस हड़ताल से देश में मजदूरों के लिए बुनियादी बहस की शुरुआत हुई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बोनस इज द डेफर्ड वेज और इसी सिद्धांत के आधार पर रेल कर्मचारियों के संगठन ने बोनस की मांग की थी। फर्नांडीस और रेल मजदूर संगठनों का यह आकलन था कि रेल कर्मचारियों की सारी मांगें पूरी करने पर भारत सरकार पर मुश्किल से 200 करोड़ रुपए का बोझ आएगा। रेल हड़ताल को तोड़ने के ऊपर सरकार ने इससे दस गुनी राशि करीब दो हजार करोड़ रुपए खर्च किए थे।

मशहूर शायर फैज अहमद फैज की गीत के साथ………

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे,

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.

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