चक्रव्यूह में फंस गई झारखंड की राजनीति

मनोज कुमार सिंह
भूमि अधिग्रहण बिल 2017 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद झारखंड की राजनीति गरमा गई है जहां एक ओर राज्य की सभी विपक्षी पार्टियां एक मंच पर खड़ी दिखाई दे रही हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ता के भागीदार आजसू ने भी भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार का विरोध किया है। वैसे देखा जाए तो सत्ता में रहते हुए आज आजसू ने स्थानीय नीति, नियोजन नीति और भूमि अधिग्रहण बिल का पुरजोर विरोध किया था लेकिन सरकार ने उसकी आवाज को अनसुना कर दिया। आज जब मामला पूरी तरह गर्म हो चुका है तो सरकार को यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस मामले से निकला कैसे जाए।

वैसे तो भूमि अधिग्रहण बिल की अनिवार्यता और उसके विभिन्न पहलुओं को लेकर जनता के बीच अपनी बात रखने की कवायद सरकार कर रही है लेकिन राज्य के माहौल को देखते हुए ऐसा लगता है कि उनकी यह कवायद शायद सफल ना हो पाए पिछले कुछ दिनों से राज्य के सामाजिक संगठन खासकर मूलवासी आदिवासी जिस प्रकार से मकान के विरुद्ध गोलबंद हो रहे हैं दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों में पत्थलगड़ी का मामला गरमाया हुआ है उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है की भूमि अधिग्रहण बिल मामले को लेकर विपक्षी पार्टियां रोटी सेंकना चाहती हैं और 2019 के चुनाव तक इसे गर्माने की कोशिश भी कर रही हैं। सरकार की ओर से कोई भी मंत्री या वरिष्ठ नेता भूमि अधिग्रहण बिल पर अपनी दो टूक राय देने से बच रहे हैं। उनकी क्या मजबूरी है यह तो नहीं पता चल रहा है लेकिन जानकारों का कहना है कि राज्य के मंत्री और वरिष्ठ नेता अपनी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं यही कारण है कि सामूहिक राय नहीं बन पा रही है। यदि कुछ समय तक यही हालात बने रहे तो विपक्ष अपनी बात लेकर जनता को वही बात समझाने में सफल होंगे जो उनके फायदे के लायक हो। ऐसा भी नहीं है कि पढ़े-लिखे लोग इस सच्चाई को नहीं जानते हों। फिर भी उनकी बात सुनेगा कौन। क्योंकि हर बात राजनीति के कसौटी पर कसने की आदत जो हो गई है। आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए स्थानीय नीति, नियोजन नीति और भूमि अधिग्रहण बिल गले की हड्डी बनती जा रही है। सरकार अपनी मंशा को कैसे न्यायोचित ठहराएगी, यह तो वक्त बताएगा लेकिन वर्तमान हालात तो यही बता रहे हैं कि इन मुद्दों पर सरकार बैकफुट पर दिख रही है राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार साढ़े तीन साल के अपने कार्यकाल को जनता के बीच सही तरीके से रखने में असफल रही है। मोमेंटम झारखंड पूरी तरह फेल रहा, कोई उद्योग धंधा लगा नहीं, लोगों को रोजगार मिला नहीं, उसके बाद कुछ विवादित फैसले होते रहे और जनता के बुनियादी मुद्दे हाशिए पर चले गए। भूख से हो रही मौतों पर जिस प्रकार सरकार अपना बयान दे रही है उनके वरिष्ठ मंत्री स्वयं हंसी के पात्र बन गए हैं। विभागीय सचिव संबंधित अधिकारी भी इस मुद्दे पर कन्नी काटते नजर आ रहे हैं ऐसा लग रहा है कि सरकार, मंत्री और अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी है या सच्चाई से मुंह मोड़ना चाहते हैं इन सभी बातों को जनता बड़ी करीब से समझ रही है और समय आने पर जवाब भी देने के मूड में है अब देखना यह है कि सत्ता और विपक्ष के बीच में इन मुद्दों पर कौन बाजी मारता है और जनता किसकी बात तवज्जो देने के मूड में है।

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