बजट के अनुलोम-विलोम में फंसी राज्य की जनता

(मनोज कुमार सिंह) मंगलवार को सदन में माननीय मुख्यमंत्री द्वारा राज्य का बजट प्रस्तुत किया गया. बजट आने के बाद से ही कुछ लोग बजट को राज्यहित, गांव का बजट, गरीबों का बजट बता रहे हैं वहीं कुछ लोग बिना आत्मा वाला बजट, दिशाहीन बजट आदि संज्ञा से विभूषित कर रहे हैं. राज्य की जनता समझ नहीं पा रही है कि राज्य के लिए बजट है कैसा? जहां एक ओर सरकार इस बार के बजट में सब गांव में कोल्ड रूम, आदिवासी क्षेत्रों में ओल्ड एज होम, रांची खरसावां में पीपीपी मोड पर सिल्क पार्क बनाने की घोषणा करती है वहीं दूसरी तरफ राज्य के युवाओं के रोजगार एवं स्वरोजगार से अधिक अवसर पैदा करने के लिए कौशल विकास की स्थापना का प्रस्ताव भी दिया है.

सरकार का दावा है कि बजट से गांव, गरीब, किसान, महिला, SC-ST को सबसे ज्यादा लाभ मिलेगा. कृषि विकास के लिए हर खेत को पानी हर हाथ को काम तथा हाथ से हाथ तक व्यवस्था लागू करने का टारगेट है. शब्दों के मायाजाल में आम लोग अनुलोम-विलोम करते नजर आ रहे हैं और इस समर्थन और विरोध के भंवर से यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वास्तव में बजट है कैसा?

अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के जानकार लोगों का यह मानना है कि बजट की भावना के मूल में आगामी चुनाव का दृष्टिकोण दिखता है, यही कारण है कि वर्तमान सरकार जहां पिछली बजटों में शहरों का ध्यान रखा था, वही अचानक गांव और किसान याद आ गये. ऐसे विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि वास्तव में बजट को प्रस्तुत करना और जमीनी स्तर पर उसको लागू करना दोनों में बहुत बड़ा गैप है, और यह दूरी बढ़ती जा रही है. सरकार की योजनाओं का समुचित लाभ आम लोगों तक पहुंचता तो है लेकिन इस बीच कई विसंगतियां दिखने लगती है.

इसलिए ऐसे विश्लेषकों का स्पष्ट मत है कि सरकार पूरी मुस्तैदी से अपनी नीतियों को गांव और गरीब तक ले जाए तो सरकार के प्रति उनका नजरिया अच्छा हो सकता है. यह सही है कि सरकार ने राज्य हित में अनेक बड़े फैसले लिए हैं और उसे अमलीजामा पहनाने का काम भी किया है, लेकिन उसका चित्रांकन नहीं कर पाई है. यही कारण है कि लोगों के बीच यह कानाफूसी होती नजर आ रही है कि इस बार भी पूर्व की भांति चलता रहा तो गांव गरीब की बात करना सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है.

लोकतंत्र में प्रतिपक्ष की भूमिका के बारे में भी जोरों पर चर्चा है. मुद्दों का विरोध करना तो समझ में आता है लेकिन सार्थक बहस में भाग ना लेना भी एक तरह से जनता के साथ अन्याय ही है क्योंकि देखा गया है कि बहुमत की सरकार विपक्ष द्वारा मजबूती से विरोध नहीं होने के कारण ऐसे फैसले ले लेती है जो राज्य हित में नहीं होते हैं और इस बिंदु पर विपक्ष के पास कोई तर्क नहीं बचता है. इस जवाबदेही से कोई भाग भी नहीं सकता. सदन में माननीय जनप्रतिनिधियों के द्वारा गंभीर विषय पर बहस ना होना राज्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है. संसदीय परंपराओं का क्षरण न सत्ता पक्ष के लिए अच्छा है न विपक्ष के लिए. अंततः इसका नुकसान राज्य की जनता को ही उठाना पड़ेगा.

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