अर्जुन के घर भीड़, झारखण्ड अधीर

पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड भाजपा के कद्दावर नेता अर्जुन मुंडा के आवास पर भाजपा विधायकों की बैठक को लेकर झारखंड की राजनीति अटकलों और कयासों से भर गई है. मुंडा के यहां पहुंचे भाजपा विधायक सीधे तौर पर तो कुछ कहने से बचते दिखे, लेकिन ऑफ द रिकॉर्ड उन्होंने बहुत कुछ कह दिया.

2 दिन से झारखंड की राजनीति जिस तरह पल-पल करवट बदल रही है. उससे सियासी उतार चढ़ाव का पैमाना आसानी से नापा जा सकता है. भाजपा के 24 विधायकों ने स्थानीय नीति के सवाल पर जो तेवर अपनाया, उसने भाजपा के रणनीतिकारों की परेशानी बढ़ा दी है. सीधे तौर पर इसे भाजपा विधायकों का विद्रोह तो नहीं माना जा सकता, लेकिन कहीं न कहीं विधायकों की परेशानी अवश्य परिलक्षित हो रही है.

चुनाव करीब हैं और अधिकांश विधायकों को लग रहा है कि सियासी नैया पार होना लगातार कठिन होता जा रहा है. सरकार बहुत कुछ कह रही है, लेकिन जमीन पर इसका राजनीतिक अनुवाद होता नहीं दिख रहा. जनता तो राजनीतिक वादों पर भरोसा करती है, बड़े-बड़े विज्ञापनों पर नहीं. ऐसे में भाजपा विधायकों का असमंजस आसानी से समझा जा सकता है. सरयू राय ने जो कहा वह इसी पीड़ा की अभिव्यक्ति है. संवादहीनता से उपजी पीड़ा धीरे-धीरे बड़े जख्म की तरफ बढ़ रही है.

अर्जुन मुंडा जी के आवास पर जुटे विधायकों ने अपनी इसी चिंता का पहली बार सार्वजनिक इजहार किया है. झारखंड की राजनीति अभी जिस मोड़ पर है, वह असमंजस बयां करती है. नेतृत्व का संकट यहां नहीं है, लेकिन नेतृत्व को अपने घेरे में लिए लोगों ने राजनीतिक संवादहीनता का ऐसा घेरा बना दिया है, जिसमें खुद भाजपा के बड़े नेता तक अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं. यही कसक अब धीरे-धीरे भाजपा नेताओं के मौन को तोड़कर उन्हें मुखर बना रही है. नेतृत्व को समय रहते इसे पहचानना चाहिए और वापस संवाद की स्थिति बहाल करनी चाहिए.

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